Thursday, December 8, 2022

{४११ } आ लौट चलें फिर उन उजालों की ओर




आ लौट चलें फिर उन उजालों की ओर 
उन जवाबों के लिए उन सवालों की ओर। 

वो गली राह देखती होगी अभी भी हमारी 
उस राह से दूर रह के बीते सालों की ओर। 

टूटे ख्वाबों से अभी भी उलझा बैठा होगा 
मेरी नादान मोहब्बत के खयालों की ओर। 

रेशमी छुअन भी होगी फिर से ज़र्रे-ज़र्रे में 
ताजी हवा आएगी फिर मतवालों की ओर। 

पतवार हौसलों की तुम जरा थाम के चलो 
रकाबत में हूँ ले चलो मुझे हमालों की ओर। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 


रकाबत = प्रेम में प्रतिद्वंदी 
हमाल = सहयोगी 

Saturday, December 3, 2022

{४१० } तुम्हारी आँखें




तुम्हारी आँखें,
बड़ी ही खूबसूरत हैं। 

बिजलियाँ गिराती हैं,
बड़ा कहर ढ़ाती हैं,
समन्दर सी गहरी हैं, 
जादू है, सम्मोहन हैं,
नदी की तरंग हैं, 
उदात्त लहरी हैं,
बड़ी कातिल हैं,
बड़ी शातिर हैं,
गहरा नशा हैं,
छलकता जाम हैं,
लगाती मुझपे इल्जाम हैं,
गुमसुम सी रहती हैं 
पर, बहुत कुछ कहती हैं,
मेरी उजली सुबह हैं,
मेरी नशीली शाम हैं,
देती है मेरे दिल को 
एक प्यार भरा पैगाम है,
ये तुम्हारी आँखें।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, November 27, 2022

{४०९} शब्दों का क्या?




शब्द,
शब्दों का क्या?

शब्द तो ढ़ेरों हैं 
अर्थ भरे और निरर्थक भी,
जिसकी जैसी ज़ुबान 
उसके पास वैसे ही शब्द। 

कुछ शब्दों पर भरोसा है 
कुछ भरोसे के काबिल नहीं,
जिन शब्दों पर भरोसा है 
वह ज़ुबान से निकलते नहीं,
जिन शब्दों पर भरोसा नहीं 
वे कूद-कूद कर बाहर आना चाहते हैं। 

शब्दों का क्या?
शब्द अब पत्थरों की तरह 
बेजान हो चलें हैं,
बस उनका इस्तेमाल किया जा रहा है,
बेवजह का उन्माद खड़ा करने के लिए। 

शब्द,
शब्दों का क्या??

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, November 23, 2022

{४०८} टूटते बिखरते सपने





जैसे-जैसे बढ़ता है सपनों का आकार 
वैसे-वैसे ही बढ़ती जाती है 
अपने हँसते हुए चेहरे को 
सपने में देखने की अभिलाषा, 
फिर, कहीं दूर 
सपने में सुनाई पड़ती है 
अपने ही सिसकने की आवाज,
और छिन जाता है 
सुन्दर सलोना सपना। 

सुन्दर सलोने सपने को 
बिखरते हुए,
टूटते हुए,
अब नहीं देखा जाता। 

चलो,
अब त्याग ही देते हैं 
इन टूटते-बिखरते 
मायावी सपनों को देखना,
और निकल चलते हैं 
इन ख्वाबों की कफ़स से
कहीं दूर, बहुत दूर।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, November 20, 2022

{४०७} बस मैं जिन्दा हूँ





बस मैं जिन्दा हूँ। 
है मुझको आभास,
बचा फकत अहसास,
कीमत में दे दिया 
उसूलों को अपने,
ले ही लिया सन्यास,
खामियों का पुलिंदा हूँ,
बस मैं जिन्दा हूँ। 

बिखरता हूँ और टूटता हूँ 
अन्दर अन्दर तड़पता हूँ 
तिल तिल खोखला होता हूँ 
खुद से खुद ही बात करता हूँ 
बिना परवाज़ का परिंदा हूँ,
बस मैं जिन्दा हूँ।। 

                                                                                      -- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, November 17, 2022

{४०६ } नज़्म कहाँ रखी है मैंने





कब से ढूँढ़ रहा हूँ 
रिसालों में,
नई-पुरानी 
किताबों के वर्क में,
नज़्म कहाँ रखी है मैंने?

नज़्म को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मिल जाते हैं 
कलम, दवात, कोरे कागज 
और मेरी बनाई हुई 
तेरी तस्वीर,
लेकिन नज़्म 
अभी भी नहीं मिलती। 
नज़्म कहाँ रखी है मैंने?

नज़्म में हरफ़ों से खिंची 
तेरी तस्वीर थी,
मेरा तसव्वुर था,
मेरी उम्मीद थी
और तुम थी,
नहीं मिलती है नज़्म। 
नज़्म कहाँ रखी है मैंने?

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Saturday, November 12, 2022

{४०५ } मोहब्बत





मोहब्बत,
जो न दिखाई देती है 
और न ही सुनाई देती है,

मोहब्बत तो बस 
सच्चे दिलों को 
महसूस होती है,

मोहब्बत, 
सुकून भी देती है 
पर उससे कहीं ज्यादा 
दिलों मे दर्द देती है, 

मोहब्बत से मिला यही दर्द
आशिक का इनाम है,
और यही दर्द 
आशिक की 
बेशुमार दौलत भी।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, November 9, 2022

{४०४ } क्या पढ़ें हम दर्द की व्याकरण





क्या पढ़ें हम दर्द की व्याकरण 
ज़िन्दगी कट रही चरण चरण। 

सच को भी वो सच कहते नहीं 
आचरण पे पड़ा हुआ आवरण। 

मोह किससे अब कहाँ तक रहे 
बँध न पाते अब नयन से नयन। 

सत्य, सत्य को ही न पहचानता 
हो गया है यह कैसा वातावरण। 

भटकते हुए बीत रही उम्र सारी 
मिली न कहीं आशा की किरण। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, November 7, 2022

{४०३} तेरे ही इंतज़ार सी हुई ज़िन्दगी





रूठी रूठी बहार सी हुई ज़िन्दगी 
टूटी टूटी पतवार सी हुई ज़िन्दगी। 

न रोशनी है न जलता  हुआ चराग 
उजड़ी टूटी मजार सी हुई ज़िंदगी। 

न मँजिल, कारवाँ न  हमराही कोई 
उड़ते  हुए  गुबार सी  हुई ज़िन्दगी। 

जब  से  जुदा  हुए हम - आप सनम 
फुरकत मे गुनहगार सी हुई ज़िंदगी। 

हम रब से क्या माँगें खुद अपने लिये 
एक तेरे ही  इंतज़ार सी हुई ज़िन्दगी। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 


फ़ुरकत = वियोग 

Saturday, November 5, 2022

{४०२ } देने वाले ने क्या ज़िन्दगी दी है





देने वाले ने  क्या  ज़िन्दगी दी है 
क्यों  मेरे साथ  दिल्लगी की है। 

हम ने  बरसों  जिगर जलाया है 
फिर कहीं दिल में रोशनी की है। 

आप से दोस्ती का  एक हासिल 
सारी दुनिया से  दुश्मनी की है। 

लोग  मरते हैं  ज़िन्दगी के लिये 
हमने मर मर के ज़िन्दगी जी है। 

हम  को तो मारा  है ज़िन्दगी ने 
लोग कहते हैं  खुदकुशी की है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, November 3, 2022

{४०१ } अक्सर ध्यान तुम्हारा आता है





अब भी अक्सर ध्यान तुम्हारा आता है
देखूँ ? गुजरा  वक्त  दोबारा  आता है। 

आह नहीं आती है अब तो होंठों तक 
सीने में   बस  एक  अँगारा  आता है। 

जाने किस दुनिया में सोती जागती है 
जिन आँखों में ख्वाब तुम्हारा आता है। 

दिन भर परिंदों की आवाजें  आती हैं 
रात को घर में जंगल सारा  आता है। 

रातों मे  जब  चाँद - चाँदनी आते हैं 
याद  बहुत  तेरा  रुखसारा आता है।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, November 2, 2022

{४०० } नींद हैं और न हैं ख्वाब





नींद हैं और न हैं ख्वाब 
ये कैसी पिलाई शराब। 

दिल में  वीरनियाँ  बसीं 
हैं खटकते गुलो गुलाब। 

अश्कों ने उम्र भर लिखी 
मेरे ही गमों की किताब। 

सह न पाओगे तुम कभी 
मेरा ढ़लता हुआ शबाब। 

आँखों-आँखों में ही मिला 
मुझे  सवाल  का जवाब। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३९९} साया कहाँ गया





पूरी तरह से सच कभी  ये बताया कहाँ गया 
होते  ही गुम  उजाले के  साया  कहाँ  गया। 

कट कर दरख्त छत बनी, साये की चाह में 
लेकिन कोई भी पेड़ फिर लगाया कहाँ गया। 

जिद थी जिन्हे  बुझाने की  जलते हुए  चराग 
कोई चराग  फिर उनसे  जलाया कहाँ गया। 

मैं बन - सँवर के बैठा  रहा सारी  शब मगर 
ख्वाबों में  तेरे मुझ  को बुलाया  कहाँ  गया। 

ये जान भी हाजिर है  सनम आप की खातिर 
कहते सब हैं पर कभी ये निभाया कहाँ गया। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, November 1, 2022

{३९८} मेरी भी अजब कहानी





मेरी भी अजब कहानी। 
जैसे हो पीर पुरानी।। 

मैं चला निरंतर अन्तर में विश्वास भर 
सूखी-सूखी आँखों में अतृप्त प्यास भर 
न पहुँच सका तुझ तक कभी भी 
छोड़े पथ पर चरण निशानी। 
मेरी भी अजब कहानी।। 

अर्थ क्या शब्द ही रहे अनमने 
खिंचे-खिंचे से और रहे तने-तने 
मीठे-मीठे बोलों मे खारे-खारे से 
वेदना अश्रु बने पानी-पानी। 
मेरी भी अजब कहानी।। 

उजियारी रातों मे अंधियारा जैसे 
छाई काली घटा छँटेगी कैसे 
दीन दृगों में आँसू ही आँसू 
कौन सुने करुणा की वाणी। 
मेरी भी अजब कहानी।। 

                                                                                            -- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, October 31, 2022

{३९७} मेरा परिचय क्या





मैं क्या, 
मेरा परिचय क्या। 

प्रभु सत्ता से भिन्न 
मेरी अपनी सत्ता क्या। 

ये जीवन, जीव-मरण का अभिनय है, 
सुकर्म, मनुज-जीवन की यज्ञ-आहुति,
परमार्थ, मनुज-जीवन का है तर्पण,
सत्य-पथ से न हो तुम विचलित, 
रहो अग्रसर धर्म-पथ पर,
तन-मन-धन सब कर दे अर्पण,
तू क्या,
तेरा परिचय क्या। 

मैं क्या, 
मेरा परिचय क्या।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, October 30, 2022

{३९६ } तुम्हारे इंतजार में





वापस जाते हुए 
चूमना था तुम्हें,
अपनी आँखों से 
ओझल होने तक 
देखना था तुम्हें,
होंठों की बुदबुदाहट 
बन्द होने के पहले 
कहने थे कुछ शब्द,
गिनना था अँगुलियों पर 
अपनी अगली मुलाकात का 
लम्बा दुखदायी अन्तराल। 


अचानक आँखों से 
दो आँसू टपके 
और तुम यकायक 
आँखों से ओझल हो गयी। 

मैं आज भी 
वहीं अनथक बैठा हूँ,
सिर्फ तुम्हारे इंतजार में।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Saturday, October 29, 2022

{३९५ } ज़िन्दगी दर्द भी है खूबसूरत भी





अदावत भी  है और मोहब्बत भी 
ज़िन्दगी  दर्द भी है  खूबसूरत भी। 

शबे-रोज  पढ़ता हूँ  तुम्हारी आँखें 
ये शरारत भी है और मोहब्बत भी। 

ज़िन्दगी में  गर दो-चार ग़म मिले  
वो नसीहत भी है और हिम्मत भी। 

माँ का आँचल है  अपना आसमाँ  
यही इनायत भी और इबादत भी। 

यूँ ही फ़कीरी में तेरे गुण गाता रहूँ  
यही मोहब्बत भी यही इबादत भी। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, October 27, 2022

{३९४ } तुम पर है जाँ निसार





तुम पर है जाँ निसार 
कर लो अब एतबार। 

फिरता हूँ मैं भटकता 
कब से हूँ मैं बेकरार। 

तिशनगी रूह की मिटे 
आ बन कर वो फुहार। 

हो गई दर्द की इंतिहा 
सुन ले दिल की पुकार। 

जिंदा रहे मेरी मोहब्बत 
खत्म कर मेरा इंतजार। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३९३ } चाहत के हरफ़





कुछ और  मेरे पास आ 
मेरे सँग तू भी  मुस्कुरा। 

भरोसा न हो  गर मुझपे 
तू  रकीबों के पास  जा। 

क्यों हो  रही बावरी  सी 
घड़ी दो घड़ी रुक जरा। 

इस दर्द से मुझे कर बरी 
या मेरा दर्द और दे बढ़ा।  

तेरी चाहत के हैं ये हरफ़ 
तू भी पढ़ और  गुनगुना। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 


रकीब = दूसरा प्रेमी 
हरफ़ = अक्षर 

Wednesday, October 26, 2022

{३९२} ज़िन्दगी का हिसाब





मेरी  ज़िन्दगी  की  किताब 
काँटों  सजा  कोई  गुलाब। 

वक्त   की  कश्मकश   में 
ढ़ल  गया  उम्र  का शबाब। 

कभी  दिन  सवाल  से खड़े 
कभी  रात  उसका  जवाब। 

कभी रात का चाँद ज़िन्दगी 
कभी  भोर  का  आफ़ताब। 

राज नहीं जीस्त  की कहानी 
यही मेरी ज़िंदगी का हिसाब। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३९१ } जहर के घूँट हँस-हँस के पिए हैं





जहर के घूँट हँस-हँस के पिए हैं 
हम बहरहाल सलीके से जिए है। 

एक दिन हमको भी याद करोगे 
चंद अफ़साने जमाने को दिए हैं। 

हमको दुनिया से दिली मोहब्बत 
बहुत इल्जाम दुनिया ने दिये हैं। 

ग़म की दौलत भी खूब मिली है 
ज़ख्म भी खाए आँसू भी पिये है। 

न की परवाह कभी रंजों-ग़म की 
शान से रहे और शान से जिये हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, October 23, 2022

{३९० } खुशियों को कैसे मैं गम कहूँ





मिली खुशियों को कैसे मैं गम कहूँ 
मुस्काती आँखों को कैसे नम कहूँ। 

तेरा  ही तो  मेरे दिल  पर  राज है 
सिर्फ तुमको ही तो मैं सनम कहूँ। 

देख कर मुझको जो वो मुस्कुरा दे 
तो उसे दिलबर का ही करम कहूँ। 

वो तिरछी नजरों से मुझे बुला रही 
सच कहूँ इसे  या कि  भरम कहूँ। 

तुम जो आज मिले हो मुझसे यहाँ 
इसे मैं बस रब का ही करम कहूँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Friday, October 21, 2022

{३८९ } ये मेरी बज़्म नहीं





ये  मेरी  बज़्म नहीं मगर 
दिल  मेरा  यहाँ  लगा है। 

जाने वालों  को रोको मत 
रँगे-महफ़िल  तो जमा है। 

एक मँजर सा मेरे दिल में 
आरजुओं  का भी लगा है। 

उस  पर  रखो मरहम को 
जो  ज़ख्म  अभी  हरा  है। 

चलो चलें उस राहे ख्वाब पे 
जो ख्वाब आँखों में बसा है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३८८ } आँखों में बसा किसी का ख्वाब है





आँखों में  बसा  किसी  का ख्वाब है 
हुजूर उसका नूर बहुत लाजवाब है। 

बैठे हैं कई रिन्द एक लम्बी कतार में 
उसकी आँखे  जैसे महँगी शराब है। 

मेरी  फितरत  फबेगी  खूब तुझ पर 
तेरे चेहरे पर पड़ा मेरा ही हिजाब है। 

फूलों  की  घाटी में दिल का कारवाँ 
क्या खूब उतरा सुनहरा सा ख्वाब है। 

खुद से कहा-सुनी के मजे लूट रहा हूँ 
अपने सवाल का अपना ही जवाब है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३८७} हकीकत के फ़साने





खयालों   के   जमाने 
हकीकत और फ़साने। 

ज्यों बढ़ती परछाइयाँ 
उम्र से हो रहे सयाने। 

कहानी  ज़िन्दगी  की 
पुराने और नये तराने।
 
खामोशी के सिलसिले 
बुना करते सपने सुहाने। 

हवा में  खुमार  बाकी है 
अभी जिन्दा हैं वो दीवाने। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, October 20, 2022

{३८६ } ज़िन्दगी की तलाश है





ज़िन्दगी की तलाश है 
दर्द जिसका लिबास है। 

आबो-हवा में ज़हर भरा 
सारा आलम उदास है। 

एक सच के हजार चेहरे 
हर आदमी बदहवास है। 

मिटाए नहीं मिटती है ये 
न जाने कैसी ये प्यास है। 

हर सिम्त फैला है देखो 
अविश्वास ही अविश्वास है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३८५} ज़िन्दगी को खुल कर जिया कीजिए





दिल को मजबूर मत किया कीजिए 
बात दिल की भी तो सुना कीजिए। 

लाख ग़म हों जीस्त में भुला के उन्हे 
आप जरा सा मुस्कुरा दिया कीजिए। 

ज़िंदगी बस दो-चार दिन की है नेमत 
ज़िन्दगी को खुल कर जिया कीजिए। 

जब कभी भी आपका दिल हो उदास 
आप बस हमें याद कर लिया कीजिए। 

खुश रहने की कोई खास वजह नहीं 
कभी-कभी बेवजह भी हँसा कीजिए। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३८४ } कविता का जन्म





मस्तिष्क में घुमड़ती 
शून्यता को चीर कर 
विचार जन्म पाते हैं। 

शब्दों की देहरी 
चढ़ते - चढ़ते 
संवादों से 
संवाद कर 
सुदृढ़ पंक्तियों का 
सुंदर रूप लेते है। 

और तब 
कभी दिन में 
या कभी रात में 
या यूँ ही 
किसी भी समय 
जन्मती है 
एक कविता।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, October 19, 2022

{३८३ } प्यार






प्यार रास नहीं,
रंग रोमांस नहीं,
मन में पल भर को उठा 
कोई खुमार नहीं।। 

प्यार सौदा नहीं,
प्यार व्यापार नहीं,
तू न दे तो मैं न दूँ 
ऐसा कारोबार नहीं।। 

सृष्टि बस मेरी ही है 
किसी और का अधिकार नहीं 
जब हो सोंच ऐसी 
फिर तो वहाँ प्यार नहीं।। 

प्यार अकृतज्ञता नहीं,
ईर्ष्या और स्वार्थ नहीं,
कटुता और हिंसा से 
प्यार को सरोकार नहीं।। 

                                                                                        -- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३८२} कविता





कुछ पल के उथले चिंतन से 
नहीं जनमती है कविता,
हो कवि के अंतर्मन में द्वंद 
तभी पनपती है कविता।। 

दो नयनों से बहे अश्रु-धार 
तभी चमकती है कविता,
दो अधरों को मिले मुस्कान 
तभी ठुमकती है कविता।। 

सूने बिस्तर पर हो सिलवट तो 
बहुत सिसकती है कविता,
दो बाहों के आलिंगन में गुँथकर 
कुछ-कुछ सिमटती है कविता।। 

पूजा के श्रद्धा सुमनों में 
बहुत महकती है कविता,
क्रोधित मन में अग्नि-ज्वाल बन 
बहुत धधकती है कविता।। 

वात्सल्य भरी, ममतामयी सी 
छल-छल छलकती है कविता,
आवेश-ईर्ष्या-द्वेष-क्रोध सँग 
खूब उफनती है कविता।। 

मेरे मन से होकर उत्पन्न 
मेरे भावों से निखार सँवर 
तेरे कोमल मन तक भी 
यही पहुँचती है कविता।। 

                                                                                            -- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, October 18, 2022

{३८१ } अम्मा





अम्मा,
आज तुम्हारी 
बहुत याद आ रही है। 

यूँ तनहा छोड़कर मुझे 
कहाँ चली गई हो तुम?

हर पल तेरी यादों में 
आँखे नम ही रहती है,

नहीं कर पा रहा समझौता 
इस वीरान हुई जिन्दगी से,

आदत रही है हमारी 
हमेशा तुम्हारे दुलार की,

उन दुलार भरे 
हाथों का स्पर्श 
महसूस करता हूँ 
आज भी स्वप्निल नींद मे,

पर, अक्सर ही 
नींद के लिए रात से जूझता 
ढूँढ़ता तुम्हारा चेहरा 
आसमान में चमकते 
इन चाँद सितारों में,

रात के नीरव सन्नाटे से डर कर 
तुम्हें ही खोजता शून्य में,
पर तुम,
दूर, शायद बहुत दूर 
चली गई हो 
फिर न वापस आने के लिए। 

अम्मा,
बहुत याद आ रही हो तुम। 

अम्मा,
ओ अम्मा।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, October 17, 2022

{३८० } तुम्हारा वस्ल ही मरहम है





बड़ा ही वीरान मौसम है 
आँख भी हमारी नम है। 

कभी मिलने चले आओ 
हर जानिब तेरा ही ग़म है। 

तुम्हें इल्म है मेरे दिल का 
तुम्हारा वस्ल ही मरहम है। 

अँधेरी रात औ' तन्हा दिल 
दिए की लौ भी मद्धम है। 

यूँ न रूठ कर तुम जाओ 
ग़म वैसे भी नहीं कम हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३७९} दर्द कितना हो आह मत करना





इश्क तुम खामख्वाह मत करना 
ज़िंदगी को यूँ तबाह मत करना। 

ज़िन्दगी तो इम्तिहान लेती ही है 
दर्द कितना हो आह मत करना। 

हुस्न तो होता ही है बड़ा फरेबी
उसकी तरफ़ निगाह मत करना। 

जो तुम्हें चैन दिल का दे न सके 
ऐसे शख्स की चाह मत करना। 

आँख मूँद के किसी से इश्क क्यूँ 
देखो तुम ऐसा गुनाह मत करना। 

साथ पाना हो जिससे नामुनासिब 
उनसे कोई भी निबाह मत करना। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 


निबाह = निर्वाह 

{३७८} हाँ शायद कल





बर्फ हो गईं संवेदनाएं 
अकड़ रहे हैं शब्द 
कँपकपा रही हैं भावनाएं 
कामनाएं चुप .........
और 
कल्पना स्थिर .........

आवाज अँधेरे कुहासे में 
डूबी हुई .........
सपाट पृष्ठ पर 
अंकित हो रही 
दहकती हुई चीख .........

चटक रहे हैं 
सन्नाटे .........,

सपने सर्द लिहाफ में 
सिकुड़ते जा रहे .........,

भोग रहा हूँ 
कर्मों का फल .........। 

पर कब तक?
कब मिलेगा 
सुकर्म का फल .........

बाट जोहता प्रारब्ध 
समय को बीतते देख रहा है। 

सोंच रहा है .........
शायद कल 
अच्छा होगा समय,
कल बदलेगा भाग्य,
शायद कल आएंगें 
खिलखिलाते हुए क्षण,
कल शांत होगा मन,
शायद कल ..................
हाँ, शायद कल ..................।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, October 16, 2022

{३७७ } ख़बर





चारों तरफ़ सन्नाटा है,
कहीं शोर सुनाई नहीं पड़ता,
इंसानियत खामोश है,
नपुंसकता की परिभाषा 
हिजड़े तय कर रहे हैं,
गूँगे फुसफुसा रहे हैं,
बहरे सुनने लगे हैं,
और लँगड़ों की 
फर्राटा दौड़ हो रही है,

शायद हम ऐसी ही 
खबरों की प्रतीक्षा में हैं,

तभी तो,
देशभक्ति और राष्ट्रवाद की ख़बर 
अब हमें रोमांचित नहीं करती,
बड़ी नहीं लगती,

ये खबरें हमें 
उत्तेजना से परे 
बर्फ़ की तरह 
ठण्डी लगती हैं,
और हमें ठण्ड से परहेज है।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३७६ } हार या जीत





अपनों की हार में 
अपनी ही हार है 
इस बात से ना-वाकिफ़ 
या 
इस बात से गाफिल लोग ही 
रिश्तों में जँग शुरू कर 
रिश्तों मे दरारें डालते हैं,

ऐसी दरारें 
जिन्हे भर पाना 
अत्यन्त कठिन होता है,

हे ईश्वर !
ऐसी जँग से 
सभी को बचाए,

जिससे,
अपनों की हार में 
अपनी ही हार का 
सामना न करना पड़े।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Saturday, October 15, 2022

{३७५ } कल का इंतजार





न जाने कितने कल 
आ कर बीत गए 
और कितने ही आज 
जो वर्तमान थे 
वो सारे कल में बदल गए 
पर मैं 
आज भी न जाने 
किस कल के इन्तजार में 
अपने वर्तमान को 
आज से कल में 
बदलने को आतुर हूँ 
यह सिलसिला निरंतर 
चलता ही रहेगा। 
चलता ही रहेगा।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३७४ } लफ़्ज़ लफ़्ज़ कराह रहा





हिज़्र में उसकी जल रहे 
प्राण हैं जैसे निकल रहे। 

जो भटकते रहे उम्र भर 
वो कदम नहीं सँभल रहे। 

दर्द मुझसे कभी न दूर थे 
आस-पास ही टहल रहे। 

लफ़्ज़ लफ़्ज़ कराह रहा 
दीदा-ए-नम मचल रहे। 

उखड़ रही अब साँस भी 
यूँ सिसकियों में पल रहे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३७३} समय





ये कैसी है 
आफत..........

हर तरफ है 
नफरत ..........

खो गई है 
इशरत ..........

आँखों में बसी 
हिकारत ..........

बची नहीं 
अनारत ..........

कोई तो निकले 
सूरत ..........

फ़िर से हो 
मोहब्बत ..........।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 


इशरत = आनन्द 
हिकारत = घृणा 
अनारत = अनुरक्ति, प्रेम 


Friday, October 14, 2022

{३७२ } नया जगमगाता स्वर्णिम सबेरा





जहाँ है अक्स ग़म का 
वहाँ होगा जरूर खुशियों का चेहरा,
जहाँ है हँसने पर बंदिशें 
वहाँ होगा जरूर रोने पर पहरा,
जहाँ ज़िन्दगी में है गहरा अँधेरा 
वहाँ छुपा होगा जरूर स्वर्णिम सबेरा,
जहाँ छिपा है अज्ञान और असत्य 
वहाँ होगा जरूर गूढ़ ज्ञान और सत्य। 

फिर क्यों मनुष्य निराशा को 
इस कदर करता है 
हावी अपने मन पर,
यह जानते हुए कि 
होता है हर अँधेरे के बाद 
नया जगमगाता स्वर्णिम सबेरा। 
नया जगमगाता स्वर्णिम सबेरा।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३७१ } अपनों को कभी मत भुलाओ





कौतुहल हैं मन में अनेक,
उठते संशय भी दो-एक,
हम एक गाँठ खोलते 
गुत्थियाँ उलझ जाती अनेक। 

अपनों को ठुकराना,
गैरों को गले लगाना। 

अपनों से है बैर 
गैरों की पूँछें खैर। 

अपनों के आने से उदास,
गैरों के स्वागत में उल्लास। 

अपने हो गये पहेली,
गैरों से होती अठखेली। 

धुंध भरा काला साया,
मन में सबके छाया। 

पर, मैं तो बस यही कहता 
वक्त कैसा भी आए सामने 
अपना किरदार कभी मत गिराओ। 
अपने से अपनों को कभी मत भुलाओ।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, October 13, 2022

{३७० } दुश्वारी ही दुश्वारी है





दुश्वारी ही दुश्वारी है 
जीना भी लाचारी है। 

करता है मुझे याद 
उससे मेरी यारी है। 

खुशियों का हो चमन 
कितनी जिम्मेदारी है। 

इश्क हम कैसे करते 
क्या औकात हमारी है। 

मतलब से मतलब रखना 
कहलाती होशियारी है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, October 11, 2022

{३६९} तुम कविता हो





तुम कविता हो। 
कविता तेरे होंठों की लाली 
कविता तेरी चाल मतवाली 
कविता तेरी मन्द मुस्कान 
कविता जिस पर मैं कुर्बान 
तुम सरिता हो। 
तुम कविता हो।। 

कविता तेरे नूपुर की रुनझुन 
कविता तेरे मानस की गुन-गुन 
कविता तेरा मुझसे रूठ जाना 
पहले इठलाना फिर मान जाना 
तुम रूप-गर्विता हो। 
तुम कविता हो।। 

कविता तेरी तिरछी नज़र है 
चीर जाती जो मेरा जिगर है 
ईश्वर की अद्भुत रचना हो 
कवि की कोमल कल्पना हो 
तुम देव-निर्मिता हो। 
तुम कविता हूँ।। 

                                                                                            -- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, October 10, 2022

{३६८ } आजादी गीत






गली गली में बजते देखो आजादी के गीत 
जगह जगह झंडे फहराएं यही पर्व की रीत 
बहे पवन, परचम फहराए, याद दिलाए जीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

आजादी तो मिली किन्तु क्या वाकई आजाद हैं 
भूले जनमानस को नेता अनसुनी फ़रियाद हैं 
मंहगाई कि मारी जनता, भूल गई ये जीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

हमने पाई आजादी, भाग गए गोरे-अंग्रेज 
किन्तु बटवारे की पीड़ा, दिल में अब भी तेज 
भाई हमारा हुआ पड़ोसी, भूल गए सब प्रीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

योगी हम अपनी ही धुन के, सदा चमकता भाल 
देश ध्वज उठा हाथों मे, दशा देश कि रहे संभाल 
हर पल में याद रहे बस, अपना गौरवपूर्ण अतीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

दिया हमारे वतन का, जलता रहे सदा 
पौधा आजादी का, फलता रहे सदा 
कर्जा अभी बड़ा है, हुआ अभी न वीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

                                                                                        -- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

( वीत = मुक्त )

Sunday, October 9, 2022

{३६७ } हम न लड़खड़ाते हैं





दाँव पर अपने दिल को हम लगाते है 
चाहते हैं जिन्हे, उन्ही से मात खाते हैं। 

आगे-पीछे खाई है, बचें तो हम कैसे बचें 
चलो इस मुसीबत में मुकद्दर आजमाते हैं। 

हम हँसते खुशियों में खिलखिला कर खूब 
और मुश्किलों में भी हम यूँ ही मुस्कुराते हैं। 

बुझाते थे कभी दूसरों के घरों की आग को 
आज अपने घर की आग से दामन जलाते हैं। 

पाँव में पड़ी हैं मजबूरीयों की कड़ी-बेड़ियाँ 
मस्त चल रहे फ़िर भी हम न लड़खड़ाते हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Friday, October 7, 2022

{३६६ } दास्ताने-ग़म किसी को क्या सुनाऊँ





कितने पिये दर्द के आँसू क्या बताऊँ 
दास्ताने-ग़म किसी को क्या सुनाऊँ। 

रिश्तों के आईने में पड़ चुकी हैं दरारें 
आईने से चेहरा अपना कैसे छुपाऊँ। 

चारों तरफ से चल रही हैं तेज हवाऐं 
इन आँधीयों के बीच दीप कैसे जलाऊँ। 

आवारगी में ही कट गई मौसमें-बहार 
पतझड़ों में दामन अपना कैसे बचाऊँ। 

साजिशें सभी मेरे अपनों की ही तो थीं 
इल्ज़ाम दुश्मनों पर भला कैसे लगाऊँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३६५ } क्या बताऊँ कि मैं कैसा हूँ





क्या बताऊँ कि मैं कैसा हूँ 
ईश्वर कि रची बिसात का 
बस एक मोहरा हूँ,

स्वयं बाजी चल नहीं सकता,
बस ईश्वर कि चली चाल पर 
किसी प्यादे की तरह 
कभी आगे कभी पीछे चलता हूँ,

कभी खुश होता हूँ 
तो कभी खूब रोता हूँ। 
क्या बताऊँ कि मैं कैसा हूँ।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, October 6, 2022

{३६४ } दिये मोहब्बत के क्यों जला नहीं देते





मुकद्दर मेरा तुम क्यों बना नहीं देते 
इक झलक क्यों दिखला नहीं देते। 

मरीजे-इश्क की इतनी तो खैर कर 
जानम बगैर जुर्म के सजा नहीं देते। 

दिए हैं ज़ख्म तो आहें भी अता कर 
ये खाली जख्म तन्हा मजा नहीं देते। 

दगा देते हैं मतलब परस्त ही केवल 
वफ़ा परस्त किसी को दगा नहीं देते। 

हर एक सिम्त नफरत ही नफरत है 
दिये मोहब्बत के क्यों जला नहीं देते। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, October 5, 2022

{३६३ } मैं तलछट





मैं तलछट सा 
निकाल कर 
फेंक दिया गया हूँ, 

किनारे पर 
निर्विकार भाव से 
अठखेलियाँ करती 
लहरों को 
मेरा सहलाना 
किसी को भी 
रास नहीं आया। 

आखिर 
तलछट को 
यूँ तिरस्कृत कर 
फेंक देना ही तो 
उसका भाग्य है,

और मैं 
भाग्य को 
भोग रहा हूँ।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल