Tuesday, December 27, 2011

{ ७४ } आदमी हूँ





आदमी हूँ, पर आदमी होना कोई मजाक नही है
सच है इससे ज्यादा कुछ और दर्दनाक नही है।

रोज-ब-रोज पीना ही है हमको खून के ही आँसू
दिखाना है जमाने को कि ये जिगर चाक नही है।

झील में कफ़ासत और आँख में आँसू की तरह
दर्द है दिल का अलंकार, क्या यह मजाक नही है?

मंजिलें हैं अभी बहुत दूर, रास्ते सभी धुँधला गये
पग-पग गिरे बिजली, क्या राह शोलानाक नही है?

जख्म यादों के हरे हो जब-तब टीसते से रहते है
दर्द की बेचैनियों मे अश्कों की कोई फ़िराक नही है।

ज़िन्दगी कम, काम ज्यादा, मौत मोहलत दे न दे
लडना है खुद से ही, पर हाथ में कोई यराक नही है।


.......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


चाक=कटा हुआ
कफ़ासत=काई, गंदगी
शोलानाक=अंगारों से भरा
फ़िराक=खयाल
यराक=अस्त्र-शस्त्र


Sunday, December 11, 2011

{ ७३ } गमों का पर्वत ले लिया हमने.....






ज़िन्दगी में जाने कितना आँसुओं को पिया हमने
ज़िन्दगी को इकरामे-ज़िन्दगी सा कब जिया हमने।

कानों को झूठ सुनने की आदत हो चुकी है इसकदर
सच न कह दूँ इसलिये जुबाँ को ही सी लिया हमने।

न मंजिल है, न मंजिल की कोई दूर तक है उम्मीद
बस मंजिलों से ही इंतिहाई फ़ासला ही किया हमने।

हम अपनी मंजिलों से इस तरह बेखबर न हुए होते
खुद के साथ भी तो केवल खुदफ़रेब ही किया हमने।

ये किस अजीयत देह सी दुनिया में आ गये है हम
अपने हिस्से मे कितने इल्जामों को ले लिया हमने।

दरब हैं तो क्या दोस्त-दुश्मन सभी ने मुझको परखा
कसौटी पर इम्तिहान से कब किनारा किया हमने।

जहाँ में हर कोई अपना-अपना मुकद्दर ले के आया है
सभी लब मुस्कुरायें, गमों का पर्वत ले लिया हमने।

न जमीं का होश रहा, न आस्माँ की है मुझको खबर
गमों में ही गुम होकर सारी उम्र को बिता दिया हमने।

अब क्या बचा है जिसके सहारे जी सकें हम ज़िन्दगी
ख्वाब-तसव्वुरों को दुनियासाजी में बिखरा दिया हमने।

जीने की तमाम कोशिशों का आखिरी नतीजा यही हुआ
मरते हुए कुछ और मर गया, यही महसूस किया हमने।


................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


इकरामे-ज़िन्दगी=भगवान की दी ज़िन्दगी

इंतिहाई=लम्बा

खुद फ़रेब=खुद को धोखे मे रखना, आत्मवंचक

अजीयत देह=कष्टदायी

दरब=खरा सोना

दुनियासाजी=बनावटी बातें


Saturday, December 3, 2011

{ ७२ } बेनाम आँसू






जब से गये हो तुम जीना भी दुश्वार हो गया
हर एक लम्हा ज़िन्दगी का नागवार हो गया।

उन ख्वाबों को अपनी आँखों से कैसे जुदा करे
जो ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सेदार हो गया।

ख्वाब अक्सर ज़िन्दगी का जंजाल हुआ करते
कुछ सच्चे ख्वाबों का अहम किरदार हो गया।

संगदिल जिस्मों के बंजर देख आँसू हुए बेनाम
दिलजोई अब नही रही इश्क भी लाचार हो गया।

हमने जिसको प्यार से सींचावो हुआ जहरीला
संवारे संवरता नही, इश्क तन्हा मीनार हो गया।


.......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


दिलजोई=संवेदना


Wednesday, November 23, 2011

{ ७१ } वस्ल-ओ-मोहब्बत






रोज का ही किस्सा हुआ तुम पर आँखे ठहर जाने का
अरे ! किससे सीखा है ये हुनर दिल में उतर जाने का|

जिन्दा रहने के सिवा और कुछ भी काम न था मेरा
अब मजा आने लगा है मुझे ख्वाबों में उतर जाने का|

आंखों में हमने मोहब्बत के सुनहरे सपने सजाये हैं
करीब आओ, ये वक्त नहीं है पास से गुजर जाने का|

जरा देखो, अब तो सिन्दूरी शाम ने भी दस्तक दे दी है
है सही वक्त यही, इश्क के समन्दर में उतर जाने का|

सुकूँ, प्यार, वफाए-इश्क, रवादारी, वस्ल-ओ-मोहब्बत
चलो बनाएँ रास्ता इन सबको ज़िगर में ठहर जाने का|

तुम्हारा रूखसार सागरों-मीना है और आंखों में मैखाना
आरजू है यही बस यूँ पीते-पीते उम्र के गुजर जाने का|

दुनिया की तो दुनिया जाने, हम तो बस अपनी जानते हैं
डर है, मिल के तुमसे इस दुनिया से ही दरगुजर जाने का|


............................................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल



वफाए-इश्क=प्रेम करके निखाना

रवादारी=सहृदयता

वस्ल-ओ-मोहब्बत=प्यार और मिलन

दरगुजर=अलग-थलग


Tuesday, November 22, 2011

{ ७० } अपनी हस्ती = काँटे उलझन






ज़िन्दगी में अगर गम न हों तो ज़िन्दगी नही
आँसुओं से आँखें नम न हों तो ज़िन्दगी नहीं।

ज़िन्दगी की इस रहगुजर में दोनो रंग जरूरी हैं
पर कोशिशों का मरहम न हो तो ज़िन्दगी नही।

काँटे और उलझन अपनी हस्ती और किस्मत हैं
गर्दिश को बदलने का दम न हो तो ज़िन्दगी नहीं।

रखता रहा हूँ कहकहों में छुपाकर अपनी उदासियाँ
गर साथ हमदम का भरम न हो तो ज़िन्दगी नही।

मानता हूँ दुनिया है फ़ानी चार दिन की ज़िन्दगानी
ज़ीस्त की गज़ल सा ज़रम न हो तो ज़िन्दगी नही।


..................................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


ज़रम=इलाज


Thursday, November 17, 2011

{ ६९ } वो आब आता नही







बादलों में न जाने क्यों वो आब आता नहीं
हवाओं का रुख अब्र को हम तक लाता नहीं|

जिन दरख्तों के तले मिलती थी मुझे छाँव
उन दरख्तों तक अब मुझे कोई बुलाता नहीं|

मंजिलों को जा रहा अब कोई काफिला नहीं
उनके वास्ते अब कोई हौसला बढाता नही|

कुछ अल्फाज़ लगने लगते हैं शमशीर सरीखे
कोई उन अल्फाजों को शमशीर है थमाता कहीं|

मैं नहीं अशआर कहता गुनगुनाने के लिये ही
मेरे सुखन पढने वाला सोचता रह जाता कहीं|


................................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, November 16, 2011

{ ६८ } मस्त फ़िज़ा






ये बादल जो उमडे हुए हैं, कहीं आसमान का काजल तो नहीं हैं
बीच में खिली धूप, कहीं आसमान का उघडा आँचल तो नहीं है।

चमन की मस्त-मस्त खुशबुओं को उडाती फ़िरती है हर तरफ़
ये मस्त हवायें, ये खिली हुई बहारें, कहीं ये पागल तो नही हैं।

कौंधती फ़िर रही, चमकती हैं बार-बार आसमान में बिजलियाँ
आने वाले किसी सुहाने से मौसम की कहीं ये पायल तो नहीं हैं।

आज तपिश का कहीं भी पता नहीं, अब तो साँझ भी घिर आई
जरा देखो तो, ओलों की बरसात में कहीं ये घायल तो नहीं हैं।


................................................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


Tuesday, November 15, 2011

{ ६७ } पीने के सबब - ३








खुद को कहाँ छोड आये भूल गया, खुद की तलाश में पी लेता हूँ
ज़िन्दगी लुटी रहगुज़र में, ज़िन्दगी की तलाश है सो पी लेता हूँ।
थोडा सा जी लेता हूँ॥

होता है जब भी शुरू अपना सफ़र अपनी फ़तहयाबी के दौर का
आती हैं अडचने और जिच से रुक जाते हैं कदम तो पी लेता हूँ।
थोडा सा जी लेता हूँ॥

क्यों लगाये तोहमत पत्थरों पर, उनका तो काम ही है चोट देना
फ़ूलों की चादर में साथ ही साथ काँटे भी बोए जायें, तो पी लेता हूँ।
थोडा सा जी लेता हूँ॥

मुझसे शिकावा-शिकायत, गैरों की मोहब्बत पर यकीं आने लगा
गैरों के इस नसीब-मुकद्दर पर तब हमें होता है रश्क, तो पी लेता हूँ।
थोडा सा जी लेता हूँ॥

अपनो की गुलजार महफ़िल में बैठ कर भी मैं तनहा ही बना रहा
हर लुत्फ़ गुम चुका है, कहीं भी ढूँढे न मिले सुकूँ, तो पी लेता हूँ।
थोडा सा जी लेता हूँ॥

इस शहर में सभी हैं चैनो-आराम से आबाद, बस मैं ही तनहा रहा
यह सब सोंच के हुआ करता है मेरा मन भी उदास, तो पी लेता हूँ।
थोडा सा जी लेता हूँ॥

भटक रहा हूँ बनकर घायल पंछी, मैं जंगल-जंगल, बस्ती-बस्ती
बुझी-बुझी सी, थकी-थकी सी होती है जब-जब शाम तो पी लेता हूँ।
थोडा सा जी लेता हूँ॥


................................................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


जिच=रुकावट

Thursday, November 10, 2011

{ ६६ } क्या करूँ







हर लमहा है आँसुओं की बरसात, क्या करूँ
होठ सिले हुए पर मुँह में है बात, क्या करूँ।

हमें तो महसूस होती है तेरे दिल की धडकन
तुम भी तो समझो मेरे ज़ज्बात, क्या करूँ।

अक्स तुम्हारा ही घूमता नजरों के सामने
कब होगी मेरी तुमसे मुलाकात, क्या करूँ।

नजदीक आते हो पर चन्द समय के लिये
रुको मेरे पास, हों ऐसे हालात, क्या करूँ।

खो चुका हूँ मैं अपना सब चैन और आराम
दिल में सिर्फ़ तुम्हारे खयालात, क्या करूँ।

तुम्हारे भी हाल क्या है, जानता अकेला मैं
बाकी अपने दुश्मनों की जमात, क्या करूँ।

देखा जब से तुम्हे रातों को नीद आती नही
आगे बीते चैन से हमारी हयात, क्या करूँ।


........................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Wednesday, November 9, 2011

{ ६५ } अन्तिम पिपास




अपना नही है कोई, मुझे किसकी तलाश है
किसको ढूँढता हूँ, कौन मेरे आस-पास है।

कोई आकर मुझे कुछ तसल्ली तो दिलाये
कौन है मेरी गज़ल और कौन मेरी प्यास है।

आँसुओं से ही अपने लहजे को सींचा किया
उदास है मेरे हर्फ़ और मेरी कलम उदास है।

साथ चल रही तल्खी, रुसवाई ही हकीकत है
अब खयालों का सहारा, ख्वाबों का लिबास है।

ज़िन्दगी की हमसफ़र हैं गमों से भरी गढरी
ज़िन्दा हूँ किस लिये, किसे पाने की आस है।

गुलशन में थी जो खुश्बुयें वे सभी मिट चुकीं
फ़िज़ा में मस्ती कहाँ, अब दर्द का एहसास है।

अब न कोई गीत, न गज़ल, न नज्म बाकी है
शून्य में लफ़्ज़, मुक्ति चाह अन्तिम पिपास है।


.......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Tuesday, November 8, 2011

{ ६४ } तनहाई है मन भी उनमन है





तनहाई है मन भी उनमन है
जाने कैसी ये शाम हो गई।
आ जाओ, अब आ भी जाओ
देखो अब तो पूरी शाम हो गई॥

तनहाई है मन भी उनमन है.......

नयनों में आँसू तिरते हैं
होठों पर खामोशी छाई
धीरे-धीरे पीर बढ रही
उस पर बेदर्द शाम हो गई॥

तनहाई है मन भी उनमन है.......

झूठे वादे है झूठी कसमें हैं
बहलाने की हर कोशिश
उम्मीदें छूटी, रोता दिन बीता
फ़िर से काली शाम हो गई॥

तनहाई है मन भी उनमन है.......

आँखों में तैरे सपन तुम्हारे
कानों में गूँजे आहट तेरी
पिया मिलन की चाह अधूरी
आँसू से भीगी शाम हो गई॥

तनहाई है मन भी उनमन है.......

उदास ज़िन्दगी आग सीने में भरे
सजीले स्वप्न सब हकीकत से परे
यह तनहाई ही अब मेरा साथी है
फ़िर खामोशी वाली शाम हो गई॥

तनहाई है मन भी उनमन है.......

आस छूटी, मन का विश्वास छूटा
बेरुखी से यह दिले-मासूम टूटा
लुट चुकी सब प्यार की दौलत
फ़िर रोती-बिलखती शाम हो गई॥

तनहाई है मन भी उनमन है
जाने कैसी ये शाम हो गई॥

............................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Monday, November 7, 2011

{ ६३ } ज़िन्दगी तेरी तलाश






तुम भी खफा हो लोग भी नाखुश हैं दोस्तों
अब यकीं हो गया कि बुरे हम ही हैं दोस्तों|

मेरा जिक्र शायद ही तेरे अफसानों में आये
मेरे न होने का अब और किसे गम है दोस्तों|

तूने कभी मेरी नाम आँखों को गौर से देखा है
क्या कहें, किसको मेरे हाल पे रहम है दोस्तों|

तेरा नाम न भी लूँ फिर भी ज़माना कहता है
इसके दिल के हौसलों में बड़ा दम है दोस्तों|

लुट के भी खुश हूँ मैं, अश्कों से भरा है दामन
जा हंसी-खुशी, तेरी आँखे क्यों नाम है दोस्तों|

जातां से पाया था, फिर किस तरह खो दिया
जिन्दगी तेरी तलाश में जीस्त खत्म है दोस्तों|

.................................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



Sunday, November 6, 2011

{ ६२ } फिर भी दिल तो है पागल-दीवाना



दोज़ख सी इस दुनिया को दिल की तकलीफ़ें क्या बताना
भर ही जायेंगे धीरे-धीरे, हैं ज़ख्म कितने, क्या दिखाना।

काँटों में उलझ कर ये दमन तिनका-तिनका सा हो गया
सुबुकती-रोती हैं आहें भी, दिल हो गया दर्द का खजाना।

मासूम दिल के एहसास का समन्दर चुपचाप ही बहा करता
आँखों के ये अश्क मोती हैं, इनको हर वक्त क्या लुटाना।

मोहब्बत में मिली चोट, हुस्न ने दी है फ़िर इश्क को मात
बेवफ़ाई कहो या कुछ कहो, पर मोहब्बत को क्या भुलाना।

मोहब्बत की चाल टेढी, इसपर क्या हँसना और क्या रोना
बोलना तो बोलना भी क्या, जान जायेगा खुद ही जमाना।

अफ़सोस, कोई भी पढता नही है मेरे दिल की इबारत को
बरबाद हुए इश्क मोहब्बत में, उस पर बेदर्द है जमाना।

खुशियाँ हरदम टिकती नहीं, बदलती यार की भी निगाहें
मिले हैं ज़ख्म गहरे-गहरे, पर हमको प्यार ही है लुटाना।

कुछ-कुछ खारा, कुछ-कुछ मीठा आशिक माशूक का रिश्ता
दर्द मिले हैं भारी-भारी, फ़िर भी दिल तो है पागल-दीवाना।


.................................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ ६१ } सूनी रहगुज़र





आहिस्ता-आहिस्ता खत्म हो चला हयाते-फ़ानी का ये सफ़र
छूट जायेगी दुनिया, यादें ही रह जायेंगीं, सूनी होगी रहगुजर।

देखना है और कब तक चलेगा अपनी जीस्त का ये सिलसिला
अब लौट कर न आ पायेंगीं कभी भी रौनकें ज़िन्दगी मे मगर।

किसी को अपना बना लूँ, नजरों में बिठा लूँ, है यह भी जरूरी
किसी को तो प्यार दूँ, किसी के तो दर्द में भीगे अपनी नजर।

किसकी आँखों से अश्क गिरेंगे, कौन होगा गमज़दा मेरे लिये
ज़िन्दगी में है यह भी जरूरी कि हो अपना भी एक हमसफ़र।

पर इन मौसमी हवाओं ने भी बदल दिये हैं अपने पुराने रास्ते
दिलकश खुशबुये किसी चमन की आती ही नही हैं अब इधर।

मिले ज़िन्दगी में मुझे कुछ शोहरत ऐसी मेरी तकदीर ही कहाँ
अपने इन हालातों पर खुद ही हँसता भी रहा हूँ मैं ही अक्सर।

ये धुआँ-धुआँ सा शामे गम का अँधेरा, ये ज़िन्दगी की थकन
उम्र भर पीता रहा मैं दर्द-ए-गम, सितम, और जाम-ए-ज़हर।

काँटों पर सदा हँस कर जिए, शोलों पर चले हैं ज़िन्दादिली से
कब मेरा जुनूँ रुका है, रस्ता हो कोई, कैसा भी रहा हो सफ़र।

चँद साँसों का ही सिर्फ़ रह गया है अब ये तमाशा ज़िन्दगी का
सिर्फ़ बाजीगरी ही तो की है हमने हमेशा अपनी इस उम्र भर।

सफ़र ज़िन्दगी का पूरा हुआ, चाहत भी कोई अब बाकी नही
अब कहाँ अपना कुछ भी खोने का रह गया है मुझको डर।

ये ज़िन्दगी तो बस एक रस्म ही है मौत के आने से पहले की
साँस लेते है हम, जिससे मिले अपने मुकामे-सफ़र का शहर।


............................................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


Tuesday, November 1, 2011

{ ६० } ग़मों से यारी हो गई





इस दुनियादारी के भँवर में फ़ंस कर
गम सहते-सहते गमों से यारी हो गई।
खामोशी ओढकर उदासी और बेचैनियाँ
जहर से बुझी तलवार दुधारी हो गई ।

गमों से यारी हो गई.......................... ।।

पाले हुए थे जो भरम वो सभी टूटे
हकीकत सुनहरे ख्वाबॊं से टकराती
दो रुखी तस्वीर हुई खुद की कहानी
खुद को सुनाना ही लाचारी हो गई ।

गमों से यारी हो गई.......................... ।।

कैसे-कैसे अजीबोगरीब से मंजर देखे
अश्कों में डूबी खुशियों पर चढती धूप
दिल पर बोझ, अन्देशों में उलझे दिन
सोंचों में डूबी हुई शामें हमारी हो गई ।

गमों से यारी हो गई.......................... ।।

बढते - बढते गम हो गये अनगिनत
खुशियाँ तो उँगलियों पर ही गिनता
बढे गमों का अब क्या हिसाब लगायें
दर्दीली आहॊं की ही बे-शुमारी हो गई ।

गमों से यारी हो गई.......................... ।।

हमको कभी भी न रास आती हैं
इस फ़रेबी जमाने की महफ़िलें
दिल के सभी गरीब ही निकले
निस्बतें भी मतलब बरारी हो गईं ।

गमों से यारी हो गई.......................... ।।

हम हैं जमाने के भटके हुए मुसाफ़िर
कुछ मकसद था इस जहाँ में आने का
देख अपनों की अपनों से ही बेवफ़ाई
खुद में सिमटना ही लाचारी हो गई ।

गमों से यारी हो गई.......................... ।।


......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


निस्बत=संबन्ध
मतलब बरारी=स्वार्थपरता

Friday, October 28, 2011

{ ५९ } मुस्कान बनाए रखिए






मुस्कान अपने लबों पर बनाए रखिये
गम के आंसू दिल में ही दबाए रखिये|

रंजीदगी बढ़ कर मीनारों सी हो गई हो
लेकिन परदों में उनको छुपाए रखिये|

जमाने को दिखाओ हंसता हुआ चेहरा
गमज़दगी को दिल में ही दबाए रखिये|

गुस्ताखियाँ तो लोगों से होती ही रहेंगी
आप मुआफियों को पास बनाए रखिये|

दिल की हर बात कहना कोई जरूरी नहीं
अपने लबों पर खामोशी सजाए रखिये|

तनहा न रहोगे इस दुनिया में कभी भी
यार न सही, एक दुश्मन बनाए रखिये|

चाहे ज़माना हो जाए खिलाफ, होता रहे
आप अपने हौसले बुलंद बनाए रखिये|

तुख्म जमीं पर बिखेरो, चमन सजाओ
यूँ खुश्बुओं का सिलसिला बनाए रखिये|

मेरे अंदाज़ से वाकिफ होगे रफ्ता-रफ्ता
मेरी ग़ज़लों पर यूँ ही नजरें जमाए रखिये|


............................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

रंजीदगी=दुःख, गम
तुख्म=बीज
रफ्ता-रफ्ता=धीरे-धीरे


Sunday, October 23, 2011

{ ५८ } .........जारी है





रेत के महलों में, उम्मीदों के संग मैंने जिन्दगी गुजारी है
उदास मंजर और आँसुओं का सिलसिला अब भी जारी है|

सवाल पर सवाल हैं और जवाब रिसते जखमों से हैं भरे
फ़िज़ा के भयानक शोर में, मेरी आवाज का डूबना जारी है|

नज़रों से मंजिल हुई ओझल, कदमों की रफ़्तार भी गुम
उदासी भरा चेहरा, नाम आँख, अश्कों का गिरना जारी है|

यादे भी सब वीरान हुईं, साथ मेरे कोई हमसाया भी नही
उलझी-बिखरी रातों में, बुझते हुए तारों का टूटना जारी है|

बड़ी उम्मीद और जातां से चमन में खुशबुओं को पिरोया
फूल खिल के महक भी न सका, टूट के बिखरना जारी है|

अब हमारी हर रात बहुत गमगीन और स्याह सी हो गयी
जुगनू-तारे भी थक चुके, पर आँसुओं का गिरना जारी है|

दिल में हरा तरफ छाए हुए हैं काले बादल गम और यास के
पर बुझती हुई शमा का अभी भी आँधियों से लड़ना जारी है|

किससे हारा, क्यों हूँ अपने ही घर में एक अजनबी की तरह
मुझमे कौन सी कमजर्फी है, सवालातों का घुमडना जारी है|

तमाम उम्र अपने दिल की आवाज को किताबों में लिखते रहे
वर्क अभी खाली हैं, जज्बातों की सियाही से सजाना जारी है|


..................................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


मंजर=दृश्य
फिजा=वातावरण
यास=निराशा
अफसाने=कहानियाँ
कमजर्फी=कमी, बुरी आदते, अनुदारता

Sunday, October 16, 2011

{ ५७ } तस्वीर का सहारा






अपने आँसुओं को रौ में कभी बहने न दिया है मैंने
दिल की बात खामोश लबों को कहने न दिया है मैंने|

जिंदगी की इस रहगुजर में कहीं तुम मिल ही जाओगे|
हर मुस्कुराते चहरे में तुमको ही तलाश किया है मैनें|

वो मंद-मंद मुस्कराहट, वो ज़रा सा छू लेने की चाहते
उन बीते पलों का अबतक बहुत इंतज़ार किया है मैंने|

तुमने तो दिल से जुदा कर भुला देने की कसम खाई है
तुम्हारी एक तस्वीर के सहारे जीस्त को जिया है मैंने|

मेरी ये ज़िंदगी जाने किस-किस दौर से गुजर चुकी है
पर आँखों में अश्क और होठों से मुस्कुरा दिया है मैंने|


................................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल




Friday, October 14, 2011

{ ५६ } वो नज़ारे कहाँ गए






ये कैसा बियाबान है वो नज़ारे कहाँ गए
वो गुलशन कहाँ हैं, वो सितारे कहाँ गए|

उड़ - उड़ के बैठ चुकी है गर्द भी राह की
दोस्तों के काफिलों के हरकारे कहाँ गए|

छाया हर तरफ अमावस का अँधियारा है
उजली चाँदनी रातों के सितारे कहाँ गए|

नजर नहीं आती अब कहीं यारों की सूरते
वो बातों, वो मुलाकातों के नज़ारे कहाँ गए|

वो चांदनी-सूरज, दिलों का प्यार नहीं रहा
शब्द केवल शेष हैं, अर्थ बेचारे कहाँ गए|


.......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Thursday, October 6, 2011

{ ५५ } साँसे महक उठी





खुश्बुओं ने है अपने पँख खोले, साँसें महक उठीं
गुलों ने ले ली है देखो अँगडाई, आँखें चहक उठी।

ये फ़कत कुछ कम नही, मोहब्बत के इस दौर में
हुआ मालामाल मैं हुस्न से, आशिकी बहक उठी।

सागर-सागर, लहरें-लहरें, गीत सजा कर लाया हूँ
माँझी उस सफ़ीने का, जिससे दरिया लहक उठी।

मैं भी पागल मस्ताना हूँ, जो दिन में जुगनूँ ढूँढूँ
दीवाना बन चमन सजाया, सब राहें महक उठीं।

हसरते लेकर मैं तेरी इस महफ़िल में आया हूँ
आओ, अब गले लगा लो, तबीयत बहक उठी।


............................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल

Monday, October 3, 2011

{ ५४ } आओ चलो दूर





आओ चलो दूर तेरे-मेरे सुर में सुर मिलाने कहीं
तेरे-मेरे गीत और गजलो-सुखन गुनगुनाने कहीं।

अब मुश्किल हमारा मिलना - जुलना हो गया है
संग -सग रहने के मिलते नहीं, नये बहाने कहीं।

चाक - दामन तो कर लिया हमने जुनूने-इश्क में
हमसे न होंगें इस दुनिया में इश्क के दीवाने कहीं।

सुलग रही है आग यकीनन, उठ रहा है जो धुआँ
क्या हकीकत के बिना कभी बनते अफ़साने कहीं।

कमबख्त इश्क में जख्म खाए, फ़िर भी हँस रहे
कुछ अश्क अभी बाकी, चलो उनको बिखराने कहीं।

मिल कर भी मुश्किल है इश्क का इजहार करना
चलो गजलों में ही इश्क की बातें गुनगुनाने कहीं।


............................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल

Saturday, October 1, 2011

{ ५३ } किस तरह जिया








आज को किस तरह से जिया हमने
रिश्तों में बस फासला किया हमने|

चिराग की लौ से परवाना जल गया
उफ़, सिर्फ अफसोस भर किया हमने|

गर चाही कुछ भी मदद कभी किसी ने
फ़ेरी नजर और किनारा किया हमने|

चाह कर भी हम नही हो सके किसी के
उम्र भर साथ का तमाशा किया हमने|

गुल नहीं किस्मत में कैसे चमन महके
दामन पर काँटे ही सजाया किया हमने|

मेहनत छोडी मुफलिसी में ही जीते रहे
और तकदीर को ही कोसा किया हमने|

इस जिन्दगी में क्या हासिल किया हमने
जिन्दगी को यूँ ही तो जाया किया हमने|


......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Friday, September 30, 2011

{ ५२ } जीना आ गया







अब मुझे अपने बहते अश्कों को पीना आ गया,
सीने में सुलगती आग को दबाए जीना आ गया|

दिल के जख्मों का कोई हिसाब नही शुमार नही,
टीस का इजहार नही दर्द को छुपा जीना आ गया|

हर तरफ धुँध और गर्द, आसमान में काला साया
खौफ़जदा दिन औ' काली रातों में जीना आ गया|

अपनी मासूमियत को ज़िंदा दफ़न कर चुका हूँ मैं
सन्नाटे की दहशत में सहमे हुए से जीना आ गया|

चाँदनी रातों में तनहा फिरता मंजिल से भटक गया
पिछला छूटा, मुस्तकबिल क्या? पर जीना आ गया|

इस जिंदगी के साथ कुछ हादसे, साजिशे ऎसी हुईं
चिटके आईने में खुद को ढूँढते हुए जीना आ गया|

किसको कहें कि कौन गुनहगार है मेरी वीरानी का
कहने के इस्तेहकाक ताक में सजा, जीना आ गया|

अपना-अपना नसीब, मेरे मुकद्दर का फैसला है यही
ख़्वाब जला, ताश के पत्तों के महल में रहना आ गया|


....................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


मुस्तकबिल=भविष्य
इस्तेहकाक=रिश्ते


Friday, September 23, 2011

{ ५१ } तमन्ना





कुछ तो हो अब ऐसा कि जीने की चाह निकले
कहीं से तो बेपनाह मोहब्बत की राह निकले|

इतना बड़ी है कायनात, इतना बड़ा है ज़माना
शिकस्ता-दिलों का कोई तो खैरख्वाह निकले|

आते जो करीब फिर बदल जाती निगाह उनकी
अब कोई तो हो ऐसा जो मोहब्बतख्वाह निकले|

वो बुरा कहता है मुझे, इसका कोई गम नहीं हमे
मनाता हूँ उसकी बददुआ सिर्फ अफवाह निकले|

मजनू को तो अपनी मंजिले-मकसूद मिल ही गई
उसकी बला से लैलाओं के जनाजे तबाह निकले|

गर्दो-गुबार कितना छाया हुआ है इस जिन्दगी में
साथ है तमाम हमराह कोई तो दिलख्वाह निकले।

हैं ये दर्दो-गम के किस्से ये आवारगी के आलम
चले ठंडी हवा के झोंके और दिल से आह निकले|



..................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



Monday, September 19, 2011

{ ५०} मै साथ हूँ







चाहत के हर मुकाम पर मैं साथ हूँ

हो गैरों की ही भीड पर मै साथ हूँ।


पलकों पर तो सजाया है तुमने मुझे

आँखों मे रोशनी की तरह मै साथ हूँ।


उल्फ़त में कुर्बान हो जाए मेरी दुनिया

पर हर अंजामे-मोहब्बत मे मै साथ हूँ।


मंजिल हम अपनी एक दिन पा जायेंगे

हमसफ़र राह पर चला चल, मैं साथ हूँ।


किस्मत हो मेहरबान या कि दगा दे जाये

पर हर तूफ़ाँ में साहिल तक, मै साथ हूँ।



............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल



Wednesday, September 14, 2011

{ ४९ } प्यार अब और किसी का है




पहले मुझसे था प्यार अब और किसी का है
मुझको आज भी इन्तजार तेरी रोशनी का है।

गुलों के बदले रहगुजर में ये खार बिछा दिये
क्यों माने कि ये काम किसी अजनबी का है।

हाल अपना क्या बताऊँ, खुद देख लें आप ही
मेरे चेहरे पर लिखा हाल मेरी बेबसी का है।

क्या लोग थे और अब क्या से क्या हो गये
कैसे यकीं करें अन नही यकीं किसी का है।

बेवफ़ाई और हुस्न ने इश्क को दी है मात
ये किस्सा भी बेजोबानों की जुबानी का है।

सभी का ही तो हक है बराबर खुदाई पर
उसे देख के लगता है कि खुदा उसी का है।


.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Saturday, September 10, 2011

{ ४८ } मुकद्दर







किसी को ताज मिलता है तो किसी को मौत मिलती है

देखना है प्यार में मेरा मुकद्दर मुझको क्या दिलाती है|


अब भी उस हसीन जिन्दगी को आइना दे सकता हूँ मैं

पर वो तो मुझ पर सिर्फ तोहमत कि बरसात कराती है|


होठों में गज़ल, सलोने सपने आँखों में उसकी भर दूँ मै

पर न जाने क्यों वो इन चांदनी रातों को अँधेरी बनाती है|


सनम के संगेदिल में सुर्ख फूल मैं एक खिलाना चाहता हूँ

करिश्मा इश्क का इधर है, वो मोहब्बत उसे कहाँ लुभाती है|


मेरा दिल जो खँडहर सा उजडा पड़ा है आ कर संवार दो उसे

जानता हूँ जब भी तुम आती हो, जन्नत खुद से शरमाती है|




................................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल




Tuesday, July 19, 2011

{ ४७ } बेचारों से हम








कब तक चुप रहेंगे बेचारों से हम,

त्रस्त कब तक रहेंगे अजारों से हम|


आग जंगल की तरफ़ अब बढ रही,

दूर कब तक रहेंगे अँगारों से हम।


दर्द से बोझिल हो गई अब ज़िन्दगी,

प्यार कब तक करेंगे गुबारों से हम।


गिर रही बिजलियाँ आशियाँ जल रहे,

छुपते कब तक रहेगे मक्कारों से हम|


तेज है सैलाब और दरके हुए बाँध है,

और कब तक थमेंगे कगारों से हम।


दोस्ती है गिध्द से जो नोचती ज़िन्दगी,

और कब तक दबेंगे अत्याचारों से हम।



................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



(अजार = रोग)



Friday, July 15, 2011

{ ४६ } जरूरत है







रक्त में जमी हुई बर्फ़ को पिघलाने की जरूरत है,

चूर-चूर हुए हृदय को जरा सहलाने की जरूरत है।


कश्ती बह रही है दरिया मे मेरी पर है लक्ष्य-हीन,

आकर उसे थोडी सी दिशा दिखलाने की जरूरत है।


खता कुछ भी नही है पर फ़िर भी सजा पाई मैने,

आकर अब थोडा सा मुझे फ़ुसलाने की जरूरत है।


अँधियारी रात है और जंगल-बियाबान की राहे है,

अब कोई रोशनी का दिया दिखलाने की जरूरत है।


कर सकूं बाते चैन से और बेफ़िक्र होकर आप से,

बस थोडा सा आपको भी मुस्कुराने की जरूरत है।


आपसे दिल मिलेगा, बात बनेगी और रौनक रहेगी,

बस थोडा सा मेरे और करीब आ जाने की जरूरत है।


जाम पर जाम चलते ही रहे अब तो ऐसी ही शाम हो,

बस एक ऐसी रंगीन महफ़िल सजाने की जरूरत है।।



......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



Monday, July 11, 2011

{ ४५ } दुर्दशा





गाँधी तुम तो कहते थे

कि भारत में फ़िर से

राम-राज्य स्थापित करेंगे..?


क्या यही राम-राज्य है....?


गाँधी कहाँ है तुम्हारी लाठी...?


शायद,

उसी को टेक कर ही

चल रही है बिगडी दिमाग वाली

भ्रष्टाचारी, निरंकुश, रक्त-पिपासु,

संवेदनहीन, डगमाती सत्ता ।


गाँधी कहाँ है तुम्हारी चप्पल...?


शायद,

सत्ताधीशों के

कठोर हाथों द्वारा

अब गरीबों की चाँद गंजी

करने के काम आ रही है ।


गाँधी कहाँ है तुम्हारी घडी.....?


शायद वो भी,

विशिष्टता को खोये हुए

भारत देश की नब्ज की तरह

कहीं पर बन्द पडी हुई है ।


गाँधी कहाँ है तुम्हारे तीन बन्दर....?


हाँ ! सिर्फ़ वो ही,

आज भी भारत को धरातल मे

ढकेलने के कार्य मे सलग्न है,

सिर्फ़ वो ही,

भारत की जनता को अक्षम

बनाने के लिये आज भी

निरन्तन अपना उपदेश दे रहे है---


" देखो मत ! सुनो मत ! बोलो मत ! "


वाह गाँधी, तुम तो चले गये

पर प्रतिबिंबों के द्वारा

भारत को रसातल मे

पहुंचाने से नही चूके ।।


................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल



(महाकवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक रचना की कुछ पंक्तियॊ से प्रभावित हो कर यह रचना लिखी है)