Friday, October 21, 2022

{३८९ } ये मेरी बज़्म नहीं





ये  मेरी  बज़्म नहीं मगर 
दिल  मेरा  यहाँ  लगा है। 

जाने वालों  को रोको मत 
रँगे-महफ़िल  तो जमा है। 

एक मँजर सा मेरे दिल में 
आरजुओं  का भी लगा है। 

उस  पर  रखो मरहम को 
जो  ज़ख्म  अभी  हरा  है। 

चलो चलें उस राहे ख्वाब पे 
जो ख्वाब आँखों में बसा है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

8 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(२४-१० -२०२२ ) को 'दीपावली-पंच पर्वों की शुभकामनाएँ'(चर्चा अंक-४५९०) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. वाह, सुंदर प्रयास।

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  3. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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  4. गहन भाव‌
    उम्दा सृजन।

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