Thursday, April 20, 2017

{३४०} नज़रों से दरकिनार मत करना





या तो किसी से प्यार  मत करना
या इश्क का किरदार मत करना।

गिरा दो ये नफ़रतों के ऊँचे महल
नादान दिलों में दरार मत करना।

नादानियों  में  खो  न  जाऊँ कहीं
नज़रों  से  दरकिनार  मत करना।

मँज़िलें  ख्वाब बन कर न रह जाएँ
ऐसे वक्त का इन्तज़ार मत करना।

दिल  की  लगी  को  दिल  ही जाने
 दिल को कभी  बेकरार मत करना।

................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

{३३९} ज़ख्म की ज़ख्म ही दवा है





यारों तुमने  सच ही कहा है
ज़ख्म की  ज़ख्म ही दवा है।

उसके  जाने  का  न  हो दर्द
दिल  पे  पत्थर  ही  रखा  है।

ज़ख्म दिखा के क्या फ़ायदा
यहाँ पे मुस्कुराना ही भला है।

शायद  वो  कभी आ ही जाएँ
दिल का दरवाजा भी खुला है।

लाश की मानिन्द  हो गया हूँ
ज़िस्म है पर जान ही ज़ुदा है।

.................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Friday, March 24, 2017

{३३८} डगर जीवन की





कैसे छोड़ूँ जीवन की आपा-धापी, कैसे कुछ आराम करूँ
झाँकूँ अतीत के झरोखों से, थकन मिटाऊँ विश्राम करूँ।

खूब लड़ चुके हम झूठ-फ़रेब से और माथे की लकीरों से
कब तक रहूँ ऐसे जग में, हम यूँ अनजान फ़कीरों से।

छूट गये खेल लुका छिपी के, सुधियाँ हुईं बिसराई सी
कब तक शर्म का पर्दा ओढ़े, साँसें सिमटें सकुचाई सी।

खोये लहलहाते बाग-बगीचे खोई महकती अमराई भी
जाने कब ये बचपन बीता, अब बीत चली तरुणाई भी।

अब कुछ उजले से, कुछ मटियाले, बीते पलों के साए हैं
फ़िर उधड़ी है बखिया यादों की बरबस ही आँसू आए हैं।

............................................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Saturday, March 18, 2017

{३३७} होली





ऐसी होली मनाओ, मजा आ जाए
दूरियाँ सब मिटाओ, मजा आ जाए।

किसी को छोटा या बड़ा समझो नहीं
खूब रँगो और रँगाओ, मजा आ जाए।

रँग में ऐसे रँग को जमकर मिलाना
भूले अपनो-पराओ, मजा आ जाए।

रँग-गुलाल डालो या न डालो, मगर
जरा सा मुस्कुराओ, मजा आ जाए।

लाख जतन करूँ मगर उतर न सके
रँग इश्क का चढ़ाओ, मजा आ जाए।


.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Wednesday, March 15, 2017

{३३६} सत्य क्या है?




सत्य क्या है?

क्या दृश्य ही सत्य है,
और अदृश्य असत्य?
या फ़िर,
दोनो ही सत्य हैं?

बहुत उलझा हुआ है प्रश्न
और शायद अनुत्तरित भी।

जो दृश्य है,
उसके होने पर सन्देह नहीं,
उसका होना सत्य है,
परन्तु,
जो दृश्य नहीं
उसे असत्य तो नहीं कह सकते।

शायद,
दृश्य और अदृश्य
दोनो ही सत्य हैं।

क्योंकि,
दृश्य स्वयं दिखता है
और अदृश्य
अपनी अनुभूति कराता है।

परन्तु,
शाश्वत सत्य क्या है?

खोज अभी जारी है
और प्रश्न भी अनुत्तरित।

बुद्धि का व्यायाम
खोल सके शायद कभी
रुद्ध द्वार को,
और पा सकूँ उत्तर
कि
सत्य क्या है।।

.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Monday, March 13, 2017

{३३५} ज़िन्दगी गीत है




ज़िन्दगी गीत है,
बस,
सुर कभी ऊँचे,
कभी मद्धिम होते रहते हैं।

सुर कैसा भी हो,
गीत नहीं रुकना चाहिये।
लय कैसी भी हो,
गीत नहीं रुकना चाहिये।
ताल कैसी भी हो,
गीत नहीं रुकना चाहिये।

ज़िन्दगी गीत है गाओ
और गाते जाओ,
ज़िन्दगी गीत है गुनगुनाओ
और गुनगुनाते जाओ।

ज़िन्दगी गीत है।
ज़िन्दगी गीत है॥

.................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, January 26, 2017

{३३४} हिसाब क्या करना






इन मोहब्बतों को सब पर यूँ ही निसार करना
मिली जो नफ़रतें उनका हिसाब क्या करना।

मेरे हिस्से में बस ये ही बेशुमार आँसू आए हैं
गमों के लगे इन ढ़ेरों का हिसाब क्या करना।

सारी मँजिलें बस ख्वाब ही बन कर रह गईं
गुजरे हुए इन रास्तों का हिसाब क्या करना।

जीस्ते-सफ़र ही तो अपने सफ़र की मँजिल है
दौराने सफ़र, दरारे राह का हिसाब क्या करना।

कितने हारे हुए हैं और कितना हैं जीत चुके
दिल की इन बाजियों का हिसाब क्या करना।


.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


१- जीस्ते-सफ़र = ज़िन्दगी की राह
२- दौराने-सफ़र = सफ़र के दौरान
३- दरारे-राह = राह के गढ्ढे

Wednesday, July 27, 2016

{३३३} काश ! कि पात से हट सके पीत रँग





वही जाना-पहचाना स्थान
वही एकान्त का उपवन
वही पेड़ की शाखा
स्मृतियों में उभरती वही छाया
यहीं पर उगा था
हमारे-तुम्हारे प्रीत का चाँद।

पर, यहाँ का एकान्त
अब हमारा स्वागत नहीं करता
और न ही करता है हमारा इन्तजार
फ़िर भी मैं
आता हूँ यहाँ बार-बार।

कि शायद कभी कोई फ़ागुनी बयार
पातों पर चढ़े पीत रँग को उतार फ़ेंके
और सूखी डालियों में
हरियाए कुछ अपनापन,
जो अलसाई हुई दोपहर में
तुम्हारी बाहों में गुजरती थी,
चिहुँक उठते थे हम
जब चहचहाते हुए पक्षी
अपने घरौन्दों को लौटते
पर हम तब भी होते थे
तुम्हारी बाहों के आगोश में।

पर, शायद अब
न वो शाम होगी
जब द्वार से चिपके तुम
बिदा देते थे मुझे
फ़िर से आने का आमन्त्रण लिये
अपनी भीनी-भीनी, मन्द-मन्द
मुस्कुराहट के साथ।

काश ! कि पात से हट सके पीत रँग
और झूम-झूम झूमे हरियाली
मन्द-मन्द सुगन्धित बयार सँग,
सम्मोहित सा मैं
कसकर समेट लूँ
तुम्हे अपनी भुजाओं में
काश कि.....................।
काश कि....................॥


.................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Wednesday, June 22, 2016

{ ३३२ } तेरा अक्स हमें खूब रुलाता है






जेहन में यादों का काफ़िला आता-जाता है
तनहाइयों में भी दिल कुछ गुनगुनाता है।

कोई दस्तक सी सुनाई दी बंद किवाड़ों पर
शायद कोई दिलजला है जो मुझे बुलाता है।

आँखों में आए बिना ही सपने गुजरते जाते
जो था हकीकत अब ख्वाब हुआ जाता है।

मिलने को आज भी मचलती हैं धडकने
दिल आज भी तेरे लिये ही रूठ जाता है।

आँखों से टपकते हैं आँसू यूँ ही अक्सर
तेरा अक्स हमे अब भी खूब रुलाता है।


................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

Sunday, June 19, 2016

{ ३३१ } गोरिया करत अपन सिंगार




गोरिया करत अपन सिंगार।
बारन मां मोतिया चमकाये
रोम-रोम महकाए
भरै माँग सेंदुर से जब
दम-दम मुखड़ा दमकाए
जूड़े मां जूही कै माला
जुलुम करै रसनार
गोरिया करत अपन सिंगार।।१।।

कानन मां जगमग बाली-झूमर
गले मां हार लटकाए
लाल-लाल आंखिंन मां ड्वारा
तेहपर काजरु सजाए
गालन मां चकमक-सुरखी चमकै
दिल का कैसे देई करार
गोरिया करत अपन सिंगार।।२।।

हाथन मां चम-चम चूड़ी चमकै
होठन मां लाली सजाए
छम-छम ओहकी पायलिया बोलै
रहि-रहि गोरिया लजाए
अंखियन ते जब चलै दुधारी
फ़ाटत करेजवा हमार
गोरिया करत अपन सिंगार।।३।।

............................... गोपाल कृष्ण शुक्ल