Monday, January 16, 2023

{४१३} बूढ़ा मन काँपने सा लगता है





कँगूरों पर जब शाम उतर आती है 
ये बूढ़ा मन काँपने सा लगता है......। 

खुशियों के चमन के फूलों की पाँखेँ 
काँटों से सजी सेज हो जाती है......

पोर-पोर तक थक कर चूर हुए दिन की 
उखड़ती साँसें तेज हो जाती हैं......

अम्बर को भेदते शिखरों का मस्त राही 
रपटीली ढ़ालों पर हाफने सा लगता है......। 

कँगूरों पर जब शाम उतर आती है 
ये बूढ़ा मन काँपने सा लगता है......।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

7 comments:

  1. कँगूरों पर जब शाम उतर आती है
    ये बूढ़ा मन काँपने सा लगता है.

    -सत्य कथन
    सुन्दर रचना

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    1. उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार आपका

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    1. उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार आपका

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  3. Replies
    1. उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत बहुत आभार

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