Sunday, February 27, 2011

{ २५ } उलझन......






नफ़रतों की आग में मेरी मोहब्बते रख दी गयीं,

मेरे हिस्से में उदासियाँ ही उदासियाँ रख दी गयी।


अब गुमसुम सा बैठा हूँ, आँसू पलकों पर ठहरे है,

दिल से दूरी नही पर कुछ मजबूरियाँ रख दी गयी।


उसके ख्वाबों के बगैर अब राहें कटती नही दम भर

मंजिल की अजानी राहों पर ही दूरियाँ रख दी गयीं।


जाने क्यो उसने मेरे दिले-मासूम के साज को तोडा

सजी हुई महफ़िल में फ़िर खामोशियाँ रख दी गयी।


लाख हँस-बोल लें, दिल में आँसू हैं, गम है चेहरे पर,

दर्द के फ़ूलों से सजा करके, तनहाइयाँ रख दी गयी।


दिन की हकीकतें हैं क्या और रातों के ख्वाब हैं क्या,

मेरी उलझी हुई ज़िन्दगी मे, तारीकियाँ रख दी गयीं।


................................................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल



Saturday, February 26, 2011

{ २४ } चलो कहीं और चले...






यहाँ की रौनकें अब अपने लिये तो रही नही, चलो कहीं और चलें,

यहाँ फ़ागुनी बयार नहीं, पतझर का मौसम है, चलो कहीं और चलें।


इस मतलबी जहाँ में तो सभी है अपनी पाक-मोहब्बत के ही दुश्मन,

अरे ! चलो छोडो इस मतलबी जहाँ को, आओ चलो कहीं और चलें।


ये जमीं भीगी है गम की आँखों के आँसुओं से, बेबसी की इन्तिहा है,

ये जंगल है बबूलों का यहां कोई गुलशन नही, चलो कहीं और चलें।


हम अंजुमनआरा हुआ करते थे कभी उनकी सजाई हुई महफ़िलों के,

अब मिलना तो दूर मिलने की आरजू भी नही, चलो कहीं और चलें।


इस जहाँ में मोहब्बत नही मेला है, किसी को किसी से क्या लेना देना,

दिन ढलते हर शख्स अपनी-अपनी राहों पे होगा, चलो कहीं और चलें।


ये कैसा शहर है, न धुआँ है, न शोला है, न मंजिल ही है, न ही है रास्ता,

न कहीं भी छाँव दिखाई देती, पूरे शहर में अंधेरा है, चलो कहीं और चलें।


आसमान अभी भी काला नही, चाँदनी से अभी कुछ-कुछ उजाला बाक़ी है,

अभी पहुँच ही जायेंगे अपने ख्वाबों की मंजिल तक, चलो कहीं और चलें।


अपनी मोहब्बत का खजाना तो लुट चुका कैसे हम दिल की हिफ़ाजत करें,

अपनी आँखों से ख्वाबों को जुदा करके, ऐ ज़िन्दगी ! चलो कहीं और चलें।



........................................................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल



{ २३ } हुस्न.....








कितना दिलकश है तेरा ये हुस्न-ए-शबाबी

बडी मादक हैं तेरे ये चश्म-ए-आफ़्ताबी

हसीन हैं तेरे ये होठ नीलोफ़रे-माहताबी

नाजुक गुल से है तेरे ये दस्त-ए-गुलाबी

रुख पर उतर आया हो जैसे रंग-ए-शहाबी

तुम हुस्न-ए-मुजस्सम हो, तुम हो हुस्न-ए-सादगी

तुम हुस्न-ए-फ़िरंगी नही, तुम हो जमाले-खुदाबन्दी

भौंचक है हर शख्स देखकर तेरा ये आबो-ताबी

तेरे हुस्न में ऐसा उलझा हुआ हूँ मै

कि अब तो जमाना भी समझे है मुझको शराबी ।


............................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ २२ } यकीन..








मोहब्बत के ज़ज़्बे को दिल में जगा के तो देखो
ज़रा मुझको अपना चश्मे-शब बना के तो देखो।

मत सोचो ये कि हम गुजरे हुए कल के सपने हैं
अब छोडो बेरुखी मुझसे दिल से लगा के तो देखो।

पाल रखें हैं दिल में जो भरम वो सभी टूट जायेंगे
ज़रा मेरी सांसों मे अपनी सांसे मिला के तो देखो।

ज़माना क्या, मैं खुद से ही अब हो गया अजनबी
आँखों से धुन्ध की इस दीवार को हटा के तो देखो।

हर शख्स की आँख से अब आँसू खुशी के ही छलकें
अपनी आँखों पर पड़े हुए परदे को हटा के तो देखो।

मेरी दफ़न हुई मासूमियत अब भी शायद ज़िन्दा है
इस जमीं से माटी की परत को जरा हटा के तो देखो।

लौट आयेंगी अपनी महफ़िलों मे फ़िर से वही रौनकें
दिल से ज़रा वैसी महफ़िल फ़िर से सजा के तो देखो।

थम जायेगी समन्दर की लहरे, आसमाँ झुक जायेगा
बेरौनक अपनी फ़ितरत को दिलदार बना के तो देखो।

इन मिट्टी के बुतों-पुतलों में ज़िन्दगी को कहाँ ढूँढते हो
अपनी ज़िन्दगी को बस ज़िन्दगी सा बिता के तो देखो


..................................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ २१ } इश्क.....






घबराइये न हिज्र और में न ही आँसू बहाइये
लिल्लाह अब तदबीर कर मेरे नजदीक आइये।

बहुत दूर-दूर रह लिये अब तो रहा जाता नहीं
हो दिल में कोई हिचक तो अब उसे मिटाइये।

जमाना सोंचेगा क्या क्यों इसकी फ़िक्र हम करें
जमाना होगा कायल, बस आप करीब आइये।

मोहब्बत आपसे है, रोज लेते क्यों इम्तिहान
वक्त काफ़ी गुजर चुका, अब फ़ैसला सुनाइये।

सफ़र ज़िन्दगी का और राह भी यकसार नही
बन जाँयें आप रहबर, मुझको रास्ता सुझाइये।

हम "यक जाँ दो कालिब" हैं, जमाना पुकारेगा
हमको बरास्ताए-चश्म अपने दिल में बिठाइये।

जब तक बाकी रहेंगी इस ज़िन्दगी में साँसें मेरी
भूल पाऊँगा आपको, ये आप खुद भूल जाइये।


............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ २० } मोहब्बत







तस्लीम कर रहा हूँ मोहब्बत मैं आपकी

चाहता हूँ उम्र भर हिफ़ाजत मैं आपकी।


होना नही है रूबरू दुनिया से अब मुझे

रहूँगा बनके जानेजाँ उलफ़त मै आपकी।


मेरी नज़र मे प्यार की भाषा को देखिये

कर दूँगा दूर सारी शिकायत मैं आपकी ।


दीदार आपके प्यार का होता रहे अगर

बन जाउँगा एक दिन जरूरत मैं आपकी ।


मुद्दत से कर रहा हूँ मैं आपका इन्तज़ार

सौपूँगा आप ही को अमानत मैं आपकी ।


............................................................ गोपल कृष्ण शुक्ल



{ १९ } दिल की पीर.......








फ़िर आज मैने एक गज़ल गुनगुनाई है
दिल में आज चोट बडी ही गहरी खाई है।

पत्थर बने मोम आबाशर भी गए हैं थम
मेरे दिल की पीर पर लगती तुम्हे पराई है।

गुमसुम हवा-मौसम, सन्नाटा टूटे आहों से
आज फ़िर से आँख आँसुओं से डबडबाई है।

अनकही तकरीरें, दिल्लगी तफ़रीह भी बन्द
ख्वाब हैं खामोश, अब साथी सिर्फ़ तनहाई है।

मौसमे-गुल तो कई बार आ-आ कर चले गये
मुद्दतें बीती मेरे चेहरे पर आयी नही रानाई है।

ऐ संगदिल तुम मस्ती मे डूबे हमसे हो बेखबर
पर ज़िन्दगी हमने झूठे सहारॊं से ही बहलाई है।

इस दर्दो-सुखन के हरफ़ों को जरा गौर से देखो
इसमे मेरे ज़ज़्बातों के अश्कों की ही रोशनाई है।

................................................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल



{ १८ } दिल की बात




मुस्कुराये एक जमाना हो गया
गुजरे लम्हों का फ़साना हो गया।


याद कहती है वह वहीं पर हैं खडे
क्या नया था क्या पुराना हो गया।


बात जो अल्फ़ाज़ को छूती न थी
दर्द दिल का पाकर तराना हो गया।


एक का ही दिल लूटने आया था जो
हर शख्स उसका निशाना हो गया।



........................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Friday, February 25, 2011

{ १७ } ...... मेरे साथ हैं





मेरी बेचैनी, मेरी उलझन, मेरी उदासी सब मेरे साथ हैं
बिछडे लम्हे, गुजरी यादों की धुँधली तस्वीरें मेरे साथ हैं।

शहर-गलियाँ-राहे-चौराहे हैं मन्दिर-मस्जिद-गुरुद्वारे हैं
भीड है, आमदोरफ़्त है, पर मेरी वीरानियाँ मेरे साथ हैं।

मैं खडा हूँ किस दो राहे पे, सितारों से आगे मंजिल मेरी
बेदम हिम्मत, टूटा परचम, पस्त हौसले मेरे साथ हैं।

दिल की बातें बोल पाना मेरे लिये कब है मुमकिन रहा
उजडे ख्वाब, बेबस खामोंशियाँ-तनहाइयाँ मेरे साथ है।

किसी को क्या कहूँ, गुनहगार हूँ मैं, गुनाह किये बहुत
खुशियाँ लुटी चौराहों पर, अब रुसवाइयाँ मेरे साथ हैं।

ज़िन्दगी के भँवर में उलझे, अब सुलझना मुश्किल है
दूर तक दिखता सैलाब, मेरी मजबूरियाँ मेरे साथ हैं।


............................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ १६ } रोया बहुत.......





किस्मत आजमाई आशिकी में
पाया तो कुछ नहीं, खोया बहुत
गया जब भी नदी के किनारे
लहरों ने भी ठुकराया, रोया बहुत।
               रोया बहुत.................।।


मैं अनुरक्त हूँ तुममें
क्या तुम भी हो अनुरागी मेरे
रात-दिन सोचा किया
सपनों को भी संजोया बहुत।
               रोया बहुत..........।।


प्रीति की प्यास बुझती नही
जलाशय जो भी मिले सूखे मिले
देख दुर्गति आसक्ति की
हृदय को आँसुओं ने भिगोया बहुत।
               रोया बहुत....................।।


कैसा है ये निष्ठुर नेह निर्वाह
अन्तर पुरुष भी रो उठा
बन कर पवन अब तक
फ़रेबी बादलों को ढोया बहुत।
               रोया बहुत............।।


अरागी आचरण की कल्पना से
खंजर से चुभने लगे
फ़ूल साथ ही ले गये
पथ पर मेरे काँटों को तूने बोया बहुत।
               रोया बहुत........................।।


कल तक था प्रियतम मेरा
आज अप्रेय हो गया
छाया भी साथ छोडती तिमिर मे
सोंच कर यह आज मैं रोया बहुत।
               रोया बहुत..................।।


भग्न हृदय तो हो गया पर
मिट न सकेगी याद तेरी इस साँस से
धुल न सकेगी अक्श तेरा इस आँख से
पुतलियों को आँसुओं से धोया बहुत।
               रोया बहुत......................।।



........................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


Thursday, February 24, 2011

{ १५ } अब कैसे मै आऊँ होश में





बोलो न, अब कैसे मैं आ जाऊँ होश में,
मेरी ज़िन्दगी तो है तेरे ही आगोश में।

तन-बदन से बेखबर, तबीयत बेहाल है
किस्मत मेरी, हो गया तेरा हमगोश मैं।

बात अपने सीने में अब तक दबा रखी है
अब कैसे बताऊँ कि हूँ तेरा वफ़ाकोश मैं।

तेरे लबों की मुस्कान करे कुछ तो इशारा
भर जायें अल्फ़ाज़े-इश्क, लबे खामोश में।

देखूँ जब भी तुम्हे रहती है तमन्ना ये ही
कैसे ले लूँ तुम्हे अपने हल्कए-आगोश में।


................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


हमगोश = पडोसी
वफ़ाकोश = प्रेमी
अल्फ़ाज़े-इश्क = प्रेम भरे शब्द
हल्कये-आगोश = भुजपाश


{ १४ } मन-बंधन







मेरे छुई - मुई से कोमल भावों को,
प्रिय छेडो मत चंचल चितवन से।

तृप्ति मिला करती केवल इनको,
अनुपम सुन्दर छवि के दर्शन से।

अनुराग रहित ये हरदम रहे सदृश,
खिल न सकेंगे केवल झूटे गुंजन से।

ये रहे वासना से सदा ही अपरिचित,
रुको ! कुम्हला जांयेंगे आलिंगन से।

अगर बाँध सको तो बाँधों इन्हे तुम,
अपने प्यार से भरे मन-बन्धन से।

............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

Wednesday, February 23, 2011

{ १३ } तुम जरूर आओगे






आओगे तुम जरूर आओगे,

पास पहलू मे मुस्कुराओगे।


पास मेरा न होना अखरेगा,

दिल की आवाज से बुलाओगे।


तुम अकेले में पास पहलू में,

हर घडी सिर्फ़ मुझको पाओगे।


हिज्र में इश्क का बीमार कहे,

जलोगे तुम भी गर जलाओगे।


रूह ने रूह को कुछ यूँ पुकारा है,

दूर मुझसे हरगिज़ न रह पाओगे।


.................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Sunday, February 6, 2011

{ १२ } साजिशें





इन हवाओं को क्या बदगुमानी हुई,

ज़िन्दगी कश्मकश की कहानी हुई।


फ़िर से चन्दन बनों ने रचीं साजिशें,

हाथ दावानलों के बेबस जवानी हुई।


फ़ासलों की दुआ हम अभी भूले नही,

अब वो नजदीकियाँ सब पुरानी हुई।


अब तो भडकेंगे क्या खाक ही खाक हैं,

आओ और दो हवा बडी मेहरबानी हुई।


हम तो बदनाम मौसम की सौगात हैं,

दर्द, पीडा, घुटन ही अब निशानी हुई।


....................................................... गोपल कृष्ण शुक्ल



Saturday, February 5, 2011

{ ११ } नजर भर देखा.....







इत्तेफ़ाकन नजर भर देखा उसको, तो फ़िर से जवानी आ गयी,
दूर हुई मन की उदासी, दिल खुशगवार, फ़िर से रवानी आ गयी।

मै बीमारे - फ़िराक, मायूस - दिल, अब तक रहा खल्वतगुज़ीं,
देख लताफ़त दूर हुआ तश्नाचश्म, लौट के जिन्दगानी आ गयी।

लब गुनगुना रहे, दिल के साज बज उठे, मन-मयूर नाच उठा,
देखा उसके चेहरे का नूर, याद हमको पुरानी कहानी आ गयी।

अब मुझे मैकदे से क्या मतलब, न दौरे-जाम की ही जरूरत है,
दिल को है सुकूँ, वापस मेरी मोहब्बत, शामे-मस्तानी आ गयी।

आँखॊ को ख्वाब दिखाले वाली, रातॊं की नीदों को चुराने वाली,
खुश्बू से दीवाना बनाने वाली, मेरा दिलबर, यारा-जानी आ गयी।


....................................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

१- बीमारे-फ़िराक = वियोगी
२- खल्वतगुजीं = एकान्तवासी
३- लताफ़त = नजाकत
४- तशनाचश्म = आँखों की प्यास