Thursday, December 8, 2022

{४११ } आ लौट चलें फिर उन उजालों की ओर




आ लौट चलें फिर उन उजालों की ओर 
उन जवाबों के लिए उन सवालों की ओर। 

वो गली राह देखती होगी अभी भी हमारी 
उस राह से दूर रह के बीते सालों की ओर। 

टूटे ख्वाबों से अभी भी उलझा बैठा होगा 
मेरी नादान मोहब्बत के खयालों की ओर। 

रेशमी छुअन भी होगी फिर से ज़र्रे-ज़र्रे में 
ताजी हवा आएगी फिर मतवालों की ओर। 

पतवार हौसलों की तुम जरा थाम के चलो 
रकाबत में हूँ ले चलो मुझे हमालों की ओर। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 


रकाबत = प्रेम में प्रतिद्वंदी 
हमाल = सहयोगी 

Saturday, December 3, 2022

{४१० } तुम्हारी आँखें




तुम्हारी आँखें,
बड़ी ही खूबसूरत हैं। 

बिजलियाँ गिराती हैं,
बड़ा कहर ढ़ाती हैं,
समन्दर सी गहरी हैं, 
जादू है, सम्मोहन हैं,
नदी की तरंग हैं, 
उदात्त लहरी हैं,
बड़ी कातिल हैं,
बड़ी शातिर हैं,
गहरा नशा हैं,
छलकता जाम हैं,
लगाती मुझपे इल्जाम हैं,
गुमसुम सी रहती हैं 
पर, बहुत कुछ कहती हैं,
मेरी उजली सुबह हैं,
मेरी नशीली शाम हैं,
देती है मेरे दिल को 
एक प्यार भरा पैगाम है,
ये तुम्हारी आँखें।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल