Friday, October 7, 2022

{३६५ } क्या बताऊँ कि मैं कैसा हूँ





क्या बताऊँ कि मैं कैसा हूँ 
ईश्वर कि रची बिसात का 
बस एक मोहरा हूँ,

स्वयं बाजी चल नहीं सकता,
बस ईश्वर कि चली चाल पर 
किसी प्यादे की तरह 
कभी आगे कभी पीछे चलता हूँ,

कभी खुश होता हूँ 
तो कभी खूब रोता हूँ। 
क्या बताऊँ कि मैं कैसा हूँ।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, October 6, 2022

{३६४ } दिये मोहब्बत के क्यों जला नहीं देते





मुकद्दर मेरा तुम क्यों बना नहीं देते 
इक झलक क्यों दिखला नहीं देते। 

मरीजे-इश्क की इतनी तो खैर कर 
जानम बगैर जुर्म के सजा नहीं देते। 

दिए हैं ज़ख्म तो आहें भी अता कर 
ये खाली जख्म तन्हा मजा नहीं देते। 

दगा देते हैं मतलब परस्त ही केवल 
वफ़ा परस्त किसी को दगा नहीं देते। 

हर एक सिम्त नफरत ही नफरत है 
दिये मोहब्बत के क्यों जला नहीं देते। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, October 5, 2022

{३६३ } मैं तलछट





मैं तलछट सा 
निकाल कर 
फेंक दिया गया हूँ, 

किनारे पर 
निर्विकार भाव से 
अठखेलियाँ करती 
लहरों को 
मेरा सहलाना 
किसी को भी 
रास नहीं आया। 

आखिर 
तलछट को 
यूँ तिरस्कृत कर 
फेंक देना ही तो 
उसका भाग्य है,

और मैं 
भाग्य को 
भोग रहा हूँ।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, October 4, 2022

{३६२ } जाने क्यों कँटीली हो गई डगर





जब अँधेरों  को हो  गई ख़बर
तब रोशनी भी हो गई बेअसर। 

हम वजन रदीफ़ में उलझे रहे 
रह गई काफिये में ही कसर। 

हर सिम्त खुद को ही ढूँढ़ा किये 
खो गए हम भीड़ मे इस कदर। 

लगाया है जब से दर्द को गले 
ज़िन्दगी भी हो गई दर-बदर। 

ता - उम्र फ़ूल ही फ़ूल थे बोए 
जाने क्यों कँटीली हो गई डगर। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, October 3, 2022

{३६१} क्यूँ तू मुझसे नज़र मिलाता नहीं





दूर रहना तुझे सुहाता नहीं 
पर नजदीक तू आता नहीं। 

हम इस कदर क्यूँ मजबूर हैं 
क्यूँ हो मंजूर जो भाता नहीं। 

तुझे शिकवा मेरे न आने का 
मेरी मुश्किल तू बुलाता नहीं। 

गैर से खुल कर तू बात करे 
मुझे देखके भी मुस्काता नहीं। 

क्या बात है कुछ कह तो सही 
क्यूँ तू मुझसे नज़र मिलाता नहीं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Saturday, October 1, 2022

{३६०} मौन हूँ मैं





मौन हूँ मैं,
मौन रह कर ही 
बता पाऊँगा दुनिया को 
कि मेरे हृदय में भी 
कुछ जज़्बात मचलते हैं,
दिल बल्लियों उछलता है,
चाहता मैं भी हूँ 
कि प्यार की कलियाँ महकें,
भावनाओं के झरने झरें,
मेघ कि हर गरज पर 
प्यार की बरसात हो,
चकाचौंध भरी इस दुनिया में 
मेरी भी एक छोटी सी चाहत है 
कि किसी हृदय रूपी प्रेम वीणा का 
गुँजित तार बनूँ,
कोई मेरे भी हृदय की 
मौन भाषा को समझे,
पर शायद अमावस की 
काली रात सा ही 
अन्धकारयुक्त है मेरा भाग्य,
इसीलिए भटकता हूँ 
उस रोशनी के लिए 
जिसका तारा अभी तक जन्मा ही नहीं।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Friday, September 30, 2022

{३५९} मासूम अश्क





तुम जब से रूठ कर 
मुझसे दूर गए हो 
एक मासूम अश्क 
पलकों के कोनों मे 
अटक सा गया है। 

शायद इस मासूम अश्क को 
आज भी तुम्हारा इंतजार है 
ये मासूम अश्क आज भी 
आस लगाए हुए है 
कि तुम आओगे 
और ललक कर उसे 
अपनी अंजुरी में भर लोगे। 

देखो !
मायूस मत होने देना 
उस मासूम अश्क को।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, September 29, 2022

{३५८} तुम सम्हले नहीं





तुम्हें याद है
पिछली बार तुम कब ठिठके थे 
अपने अंतःकरण के द्वार पर,

कब खोली थी
साँकल तुमने
अपने अंतर्मन की,

कब बजे थे 
कुछ शब्द 
तुम्हारे कानों में 
घण्टियों की तरह,

और तुम 
लड़खड़ाए थे 
संभल जाने को,

तुम सम्हले नहीं,
आजतक उसी तरह 
लड़खड़ा रहे हो,

तुम्हारी यह लड़खड़ाहट 
शायद तुमसे चिपकी ही रहेगी,
दीवार पर चिपके,
किसी इश्तिहार की तरह। । 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, September 27, 2022

{३५७ } गति और नियति





घर मे दीवारें हैं 
दीवारों मे बन्द खिड़कियाँ हैं 
बन्द खिड़कियों से 
टकराकर अपना सर 
लहूलुहान पड़ी है 
मेरी संवेदना। 

संवेदना ही आरोपित है 
संवेदना ही अपराधी है 
संवेदना ही प्रताड़ित है 
संवेदना ही दण्डित है। 

आरोप सह कर 
प्रताड़ना सह कर 
और दण्ड भी सह कर 
मेरी संवेदना अभी भी ज़िंदा है,
क्योंकि यही उसकी गति है,
और यही उसकी नियति है।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, September 25, 2022

{३५६ } लौट कर नहीं आते कभी ये






ठहरता नहीं कोई पल 
ठहरता नहीं कोई कल 
ठहरता नहीं बहता हुआ जल 
ठहरती नहीं हवा की हलचल 
क्यों देख कर रहा है मचल
क्यों हो रहा है यूँ बेकल  
लौट कर नहीं आते कभी ये 
पल, कल, जल और हवा की हलचल। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल