Thursday, February 14, 2013

{ २४१ } तनहाई में जब कभी...






तनहाई में
जब कभी
अपने ख्वाबों में
तुमसे मिलता हूँ________

सच बताऊँ प्रियतम
तुम्हे हृदय की
प्रत्येक उमंगों में
प्रतिबिम्बित करता हूँ_________

मानस-दर्पण में
प्रीति-पुष्प के
सुगँधित पराग को
रचता हूँ___________

मानस-पटल पर
कौंधते बार-बार
चन्द्र-सम आकर्षण को
चूमने को आतुर
ओष्ठ____________

प्रेमातुर हृदय के
स्पंदन में
वीणा की ध्वनि और
कोमल कँठ-स्वर का
अभिनन्दन करता हूँ________

तनहाई में
जब कभी
अपने ख्वाबों में
तुमसे मिलता हूँ___________


------------------------------- गोपाल कृष्ण शुक्ल


3 comments:

  1. bahut sunder kya gazab likha hain aapne

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  2. इश्क़ की दास्ताँ है प्यारे ... अपनी अपनी जुबां है प्यारे - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. मानस दर्पण में
    प्रीति पुष्प के
    सुंगधित पराग को
    रचता हूँ
    बेहद मोहक पंक्तियाँ

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