Thursday, November 8, 2012

{ २११ } जख्म गहरे-गहरे हैं





पाँव के काँटे, रूह के नश्तर, जीवन-जीवन बिखरे हैं
मेरी प्यासी-प्यासी आँखों में जलते सावन बिखरे हैं।

जीत की शहजादियाँ कभी मिलती नहीं हैं खैरात में
ज़िन्दगी से जीतने को हम कफ़न-कफ़न बिखरे हैं।

दिखता नहीं कोई जो दर्दे-जीस्त का मदावा कर दे
हम तमाशा से हो गये, अँजुमन-अँजुमन उजडे हैं।

कोई तो आवाज आ जाती कहीं से वापस हो कर
ये अपने ही घर के कुऐं हुए कितने गहरे-गहरे हैं।

बहुत सोंच चुका मै फ़िर भी अभी एक सोंच में हूँ
जाने किस सोंच के लिये यहाँ अभी तक ठहरे हैं।


------------------------------------- गोपाल कृष्ण शुक्ल


अंजुमन = महफ़िल
मदावा = इलाज करना


6 comments:

  1. बेहद उम्दा ... जय हो महाराज !


    क्यूँ कि तस्वीरें भी बोलती है - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. भावों से भरी रचना गोपाल जी बधाई हो आपको

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  3. behad umda,... behtareen..
    achchha laga, yahan aakar:)

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  4. वाह ... बेहद सशक्‍त लेखन
    सादर

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  5. सुन्दर रचना । आभार ।

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