जमाना गुजर गया, मुद्दतें बीतीं, तुमको देखा नहीं
तेरी याद बाकी है, अभी भी मैं तुमको भूला नही।
वो कयामत का ही दिन था, जब तुमसे हम बिछुडे
धडकने बढ गईं, दिल अब कहीं भी लगता नही।
सभी आइने मुझको देख के बडे परेशान-हैरान हैं
मैं सामने ही हूँ, पर मेरे चेहरे पर मेरा चेहरा नहीं।
मैं बीमारे-गम, अब हो गई मयखाने से दोस्ती मेरी
पैमाने साथी हैं, कदम डगमगा रहे, पर मैं बहका नहीं।
ये कैसा मौसमे-बहार, मौसमे-गुल चमन में आया है
मेरे जख्मी दिल का कोई जख्म अब तक महका नही।
ये किस मुकाम पर मुझको तनहा छोड कर चल दिये
सफ़र ज़िन्दगी का, कोई रास्ता मुझको दिखता नही।
................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल
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