Thursday, May 31, 2012

{१७७ } ढूँढे तुम्हे ये नज़र






शबो-रोज डगर-डगर, ढूँढे तुम्हे ये नजर
हाल मेरा देख, तुम हो कहाँ ऐ हमसफ़र।

न रोऊँ, न हँस सकूँ, न जागूँ न सो सकूँ
कैसी आ गई घडी, है कैसा तेरा ये असर।

रात के ख्वाबों में तू, दिन के खयालों में तू
ज़िन्दगी लगे न ज़िन्दगी, कैसा है ये कहर।

हर तरफ़ छाये अँधेरे, जख्म भी दिये तेरे
जाऊँ तो अब जाऊँ कहाँ, है मेरी किसे खबर।

ज़िन्दगी का सफ़र, बन गया है यादों का घर
न आग हुई, न धुआँ पर जल गया ये जिगर।

तुम यहाँ और वहाँ भी हर तरफ़ आती नजर
थाम लेता मैं तुम्हे काश तुम होते मेरे अगर।


---------------------------------- गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ १७६ } तन्हा जीवन





खामोशी ओढे हुये रात,
सूनी-सूनी पगडँडियाँ,
कोई हलचल नहीं,

जीवन में बसी खामोशी
मौत सी डरा रही है।

पर क्यों डरा रही है........?

उस रेतीले बँजर शहर से,
कँटीले झाड से,
जीवन को,

जो महसूस तो करता है
पर कह नही सकता
कि
मैं तन्हा हूँ।
मैं तन्हा हूँ।।


................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


Tuesday, May 29, 2012

{ १७५ } ज़िन्दगी कुछ सुन रही है





सूनी सी पगडँडी पर
एक आस अभी
साँसें ले रही है।

आँखों में निर्जीव आशा
बुझ-बुझ कर
जल रही है।

कोई तो आयेगा
इस राह पर___
देखे हैं चिन्ह मैंनें
जीवन के यहाँ पर___

पदचिन्ह कहो या
साँसों की
धीमी सी आहट।

इँतज़ार में पदचापों की
सरसराहट सुन रही है।

सूनी सी पगडँडी पर
ज़िन्दगी कुछ सुन रही है।
हाँ ! ज़िन्दगी कुछ सुन रही है।।


............................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ १७४ } मेरी नींदों को चुराया न करो





इस जहान में कुछ न भाये, ऐसे भाया न करो
चमकते जुगुनू सी, भडी भर को आया न करो।

देखा जब-जब तुमने अपनी कातिल नजरों से
दिल मचला, रूह फ़डकी, यूँ कहर ढाया न करो।

अब मैं लोगों से मिलता नहीं, न याराना ही रहा
मर जाऊँगा तो आओगे, वक्त को जाया न करो।

ये कैसा हादसा, मेरा दीवाना दिल हुआ जख्मी
मुन्तज़िर जवाब का, रगबत को छुपाया न करो।

जागती हुई आँखों में, अब ख्वाब सजा करते हैं
चाँदनी रातों में मेरी नींदों को यूँ चुराया न करो।

दिल टूटा तो मेरे वज़ूद के कोई मायने न रहेंगें
है तुमसे मोहब्बत, इसको यूँ ठुकराया न करो।

हूँ बहुत बे-करार, मिलने की आस कहाँ छूटेगी
आ गये तेरे मुकाम पर, मुझे यूँ पराया न करो।

मोहब्बत दिखाना मोहब्बत, छुपाना मोहब्बत
मैं तेरा दिलबस्त, मुझसे यूँ शरमाया न करो।


.................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


मुन्तज़िर = इन्तज़ार करना
रगबत = प्रेम
दिलबस्त = प्रेमी


Monday, May 28, 2012

{ १७३ } नई रब्त कहाँ से आयेगी





कोई नई रब्त लबों पर अब कहाँ से आयेगी
धडकनों में धडकन अब कहाँ से समायेगी।

दिल में पत्थरों की दीवारें बना ली हैं हमने
गजलो-सुखन जेहन में अब कहाँ से आयेंगीं।

मैं इस सूने - बियावान में कब से भटक रहा
छाया है अँधेरा, रोशनी अब कहाँ से आयेगी।

चमन के गुलों के रँग भी नजरों से ओझल हैं
वो खुशबू, वो मादकता, अब कहाँ से आयेगी।

गमों से लबरेज़, गम के आँसू पीने का आदी हूँ
रिंदी भी यह सन्नाटा अब कहाँ से तोड पायेगी।

गम के खजाने दिल में गहरे तक दफ़्न हो गये
मुस्कुराहट की मेरी अदा अब कहाँ से आयेगी।

लफ़्ज़ अश्कों से ढले, चेहरे की रौनकें हवा हुईं
जुस्तज़ू है, खुशियाँ लौट अब कहाँ से पायेंगीं।


............................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


रब्त = गज़ल
रिंदी = मनमौजीपन
जुस्तजू = तलाश


Sunday, May 27, 2012

{ १७२ } ऐ तन्हाई





ऐ तन्हाई !
बहुत हसीन है तू।

जब भी गुजरती हूँ
यादों की गलियों से
तो लगता है कि
जेहन के बँद दरवाजों पर
यादों का कोई काफ़िला
धीमे-धीमे रेंग रहा है,

उस पल,
फ़िर से
जिन्दा हो कर
यही सदा देती हूँ,

ऐ तन्हाई !
बहुत हसीन है तू।।


............................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

Saturday, May 26, 2012

{ १७१ } ज़िन्दगी की लक्ष्मण रेखा





ज़िन्दगी स्वयं की
लक्ष्मण रेखा में
कैद है।

जब तक मृत्यु
उसे जबरन
अपने आगोश में
नहीं ले लेती है
उसे कैद ही रहना है।

उसे जीना ही है
उसी सकरे से
दायरे में........।

मगर
फ़िर भी
उसका नाम है
ज़िन्दगी।।


......................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Thursday, May 24, 2012

{ १७० } अपनों के सितम





अपना था जो गिना नही, जो नही मिला दुखी भरपूर हो गये
पाने और खोने की इस दुविधा में, अपनों से हम दूर हो गये।

खुदगर्जी में ही रहे जीते, अब क्या होगा हासिल पछतावे से
अपनों को कर किनारे औरों के गम-खुशियों में चूर हो गये।

किसके आगे हम दुखडा रोंयें, मुझको ही सब मुजरिम माने
नजरों में सभी की गिर गये, अपनो के सितम मँजूर हो गये।

कुछ अपने भी हो गये गैरों जैसे, जख्म दिये हैं गहरे - गहरे
मरहम कितना काम करे जब अपनों से हम मजबूर हो गये।

उलझी पहेली बना अपना जीवन, मिसाल किसकी अपनायें
चमक सकी न अपनी किस्मत, सपने सब चकनाचूर हो गये।


.............................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Tuesday, May 22, 2012

{ १६९ ) अँगना में हौले-हौले शाम चली आई





अँगना में हौले-हौले शाम चली आई।
भीनी-भीनी मनभावन खुशबू है छाई।।

इन्द्रधनुषी रँग सज गये तन-मन में
मस्त-मस्त पवन सँग डोले परछाई।
अँगना में हौले-हौले शाम चली आई।।

टप-टप बूँदे बरखा की गिरें मोरे अँगना
सोंधी-सोंधी महक मिट्टी की है मन भाई।
अँगना में हौले-हौले शाम चली आई।।

भीग गई मोरे तन की ओढनिया सारी
पर मन की प्यास अबहूँ न बुझ पाई।
अँगना मे हौले-हौले शाम चली आई।।

रँग-बिरँगे फ़ूल खिल उठे मोरे अँगना
कलियन का देख मन-मन हरसाई।
अँगना में हौले-हौले शाम चली आई।।

सुर-ताल में पिया मोरे सरगम गावें
मोरे सजना रस रागिनिया खूब सजाई।
अँगना में हौले-हौले शाम चली आई।।


........................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


Sunday, May 20, 2012

{ १६८ } मैं अकेला चलूँगा ऐ मेरे साये




मैं अकेला चलूँगा ऐ मेरे साये,
कोई नही वफ़ा को याद रख पाता है,
क्यो मेरे साथ-साथ तू चला आता है।

ओ नादाँ ! मेरी मंजिल है बेनिशाँ
ओ नादाँ ! तेरा - मेरा साथ कहाँ,
बस्तियाँ छूट गईं है दूर न जाने कहाँ
बाजारें छूट गईं हैं दूर न जाने कहाँ।

मँजिलें टिमटिमायें दूर, बहुत दूर
शमा झिलमिलाये दूर, बहुत दूर,
थक गये हैं पाँव, पड गये हैं छाले
न रुकेंगे अभी, हम ठहरे मतवाले।

मैं अकेला चलूँगा ऐ मेरे साये,
कोई नही वफ़ा को याद रख पाता है,
क्यो मेरे साथ-साथ तू चला आता है।।


............................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल