पाँखुरी

Sunday, July 28, 2013

{ २७० } मेरे गीतों का सुर कहीं खो गया है

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ज़िन्दगी को ज़िन्दगी सा बिताऊँ मैं कैसे सुर बिना गीतों को गाऊँ मैं कैसे क्या पाया हमने सब कुछ खो गया है॥ मेरे गीतों का सुर कह...
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Wednesday, July 24, 2013

{ २६९ } क्योकि मैं प्रकृति हूँ

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शून्य में आकाश मेरी दृश्यता है, पृथ्वी में रज-कण मेरा अँश हैं, जल का प्रवाह मेरी कोमलता है, प्रकाश का आभास मेरी कठोरता है, ...
Thursday, June 27, 2013

{ २६८ } आज मन क्यों अनमना है

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आज मन क्यों अनमना है। उन्मत्त बादलों के सँग रहना जल प्रवाह सा कल-कल बहना डर न था कभी आँधियों से दिशा-दिशा में उत्तुंग पेंग...
Thursday, June 20, 2013

{ २६७ } तुम मेरे परिमाण हो

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मैं परिमाण तुम्हारा हूँ तुम मेरे परिमाण हो। खोजा जीवन भर सुख और शान्ति पर्वत-घाटी-शिखर-उपवन कान्ति तुम परिणाम मे मिले प्र...
Monday, June 10, 2013

{ २६६ } मजबूर आदमी

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आदमी की रूह जितनी मजबूर है अक्ल उसकी उतनी ही मगरूर है। हर आदमी तिनका सा ही लगता आदमी का कैसा दिमागी फ़ितूर है। वक्त की मार से न...
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Sunday, June 2, 2013

{ २६५ } सारे स्वप्न अभी अधुरे है

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कितने स्वप्न संजोये हमने पर सारे स्वप्न अभी अधूरे हैं। नदिया सदियों तक बहते-बहते जा कर सागर में मिल जाती हैं कलियाँ खिल कर फ...
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{ २६४ } तुम्हे न भुला पायेंगें

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तुमने हमें भुला दिया, हम न तुम्हे भुला पायेंगे लगी है आग जो दिल में, कैसे उसे बुझा पायेंगे। तेरी अदाओं और आँखों का नशा बसा जेहन में...
Monday, May 27, 2013

{ २६३ } बातें

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अब न अच्छी लगती प्यार की बातें ये सब अब हैं लगती बेकार की बातें। आसमाँ-चाँद-सितारे, गुलो-चमन से बढ कर अब हो गईं तकरार की बातें। ...
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{ २६२ } इश्क का इजहार

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हुस्न से इश्क का इजहार कर दिया खुद को हुस्न का बीमार कर दिया। हुस्न की मदभरी नज़र के जाम ने बाहवास को मय-खुमार कर दिया। छम से ...
Sunday, April 21, 2013

{ २६१ } जी लें सुख के दो चार पल

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आओ सजनि, जी लें सुख के दो चार पल समय ने बढाईं जो दूरियाँ अब टल रहीं विषम-विवशतायें हाथ अपने मल रहीं सुधियों ने, सरोवर में ख...
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गोपाल कृष्ण शुक्ल
खुश रहो !!! मस्त रहो !!!
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