पाँखुरी

Saturday, January 31, 2015

{ ३०० } प्रलय की भूमिका

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निर्माण जिसे तू कहता फ़िरता मूरख ! वह भूमिका तो प्रलय की है............. अपनी सुविधा में लगे हुए चिल्लाते हो कहते ये माँग आज के सम...
Wednesday, January 21, 2015

{ २९९ } दुख दर्द ही बचे मेरे मुकद्दर में

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ये दुख दर्द ही बचे मेरे मुकद्दर में हैं हो गया गम का बसेरा मेरे घर में है। खुशियाँ भी पास आती तकल्लुफ़ से मेरा मस्कन जो गहरे समन्द...
Saturday, January 10, 2015

{ २९८ } पर, प्रियतम तुम कभी न आये

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पर, प्रियतम तुम कभी न आये। स्मृति पट पर अब तक मैंनें जाने कितने ही चित्र बनाये, कितनी बार नयन के घन से पीड़ा के अँकुर सरसाय...
Monday, January 5, 2015

{ २९७ } बूढ़ा मन काँपने सा लगता है

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कँगूरों पर जब शाम उतर आती है ये बूढ़ा मन काँपने सा लगता है.........। खुशियों के चमन के फ़ूलों की पाँखे काँटों से सजी सेज हो जाती है...
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Sunday, January 4, 2015

{ २९६ } मोहब्बत की गहराइयाँ

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मोहब्बत में छिपी गहराइयाँ देखो झूठ मे दफ़न हुई सच्चाइयाँ देखो। दिल की दहकती आग दबती नहीं नकाब में छिपी रुसवाइयाँ देखो। खामोश रात...
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Tuesday, October 28, 2014

{ २९५ } तेरी याद आई है

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होठों का बेवक्त हँसना जुल्फ़ों का बार-बार बिखरना ख्वाबों में डुबो कर मुझे नींद का कोसों दूर चला जाना खुश्बू की मंद-मंद बयार का चल...
Sunday, October 5, 2014

{ २९४ } बेगाना मंजर

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आँखों के वो सपन चुराना मंजर हुआ अब ये बेगाना। नजरों में आ जाये मोहब्बत चल निकलेगा गम बेगाना। दिल के हाथों दर्द उठा कर भटका फ़...
Saturday, October 4, 2014

{ २९३ } ये ज़िन्दगी की पहेली

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वो कब का जा चुकी पर, उसकी जुदाई के पहले का एक नर्म सा लम्हा मेरी मुट्ठी में ज़िन्दगी की पहेली बन कर ठहर गया है। आज भी मैं ज़...
Wednesday, May 28, 2014

{ २९२ } अब नहीं सही जाती

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बन्द कमरे में अकेले बीतती यह रातें अब नहीं सही जाती। शर्म के नाखूनों से खुरची हुई दीवारें कभी हम जीते कभी तुम हारे, कभी तुम ...
Tuesday, May 20, 2014

{ २९१ } सुख का सागर है अन्तर में

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क्या रक्खा इस काया नश्वर में सुख का सागर है अन्तर में।। बाहर जग की उष्मा, मरुथल का कोलाहल बाहर पनपते हैं दँभ-द्वेष औ...
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गोपाल कृष्ण शुक्ल
खुश रहो !!! मस्त रहो !!!
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