Tuesday, October 4, 2022

{३६२ } जाने क्यों कँटीली हो गई डगर





जब अँधेरों  को हो  गई ख़बर
तब रोशनी भी हो गई बेअसर। 

हम वजन रदीफ़ में उलझे रहे 
रह गई काफिये में ही कसर। 

हर सिम्त खुद को ही ढूँढ़ा किये 
खो गए हम भीड़ मे इस कदर। 

लगाया है जब से दर्द को गले 
ज़िन्दगी भी हो गई दर-बदर। 

ता - उम्र फ़ूल ही फ़ूल थे बोए 
जाने क्यों कँटीली हो गई डगर। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, October 3, 2022

{३६१} क्यूँ तू मुझसे नज़र मिलाता नहीं





दूर रहना तुझे सुहाता नहीं 
पर नजदीक तू आता नहीं। 

हम इस कदर क्यूँ मजबूर हैं 
क्यूँ हो मंजूर जो भाता नहीं। 

तुझे शिकवा मेरे न आने का 
मेरी मुश्किल तू बुलाता नहीं। 

गैर से खुल कर तू बात करे 
मुझे देखके भी मुस्काता नहीं। 

क्या बात है कुछ कह तो सही 
क्यूँ तू मुझसे नज़र मिलाता नहीं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Saturday, October 1, 2022

{३६०} मौन हूँ मैं





मौन हूँ मैं,
मौन रह कर ही 
बता पाऊँगा दुनिया को 
कि मेरे हृदय में भी 
कुछ जज़्बात मचलते हैं,
दिल बल्लियों उछलता है,
चाहता मैं भी हूँ 
कि प्यार की कलियाँ महकें,
भावनाओं के झरने झरें,
मेघ कि हर गरज पर 
प्यार की बरसात हो,
चकाचौंध भरी इस दुनिया में 
मेरी भी एक छोटी सी चाहत है 
कि किसी हृदय रूपी प्रेम वीणा का 
गुँजित तार बनूँ,
कोई मेरे भी हृदय की 
मौन भाषा को समझे,
पर शायद अमावस की 
काली रात सा ही 
अन्धकारयुक्त है मेरा भाग्य,
इसीलिए भटकता हूँ 
उस रोशनी के लिए 
जिसका तारा अभी तक जन्मा ही नहीं।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Friday, September 30, 2022

{३५९} मासूम अश्क





तुम जब से रूठ कर 
मुझसे दूर गए हो 
एक मासूम अश्क 
पलकों के कोनों मे 
अटक सा गया है। 

शायद इस मासूम अश्क को 
आज भी तुम्हारा इंतजार है 
ये मासूम अश्क आज भी 
आस लगाए हुए है 
कि तुम आओगे 
और ललक कर उसे 
अपनी अंजुरी में भर लोगे। 

देखो !
मायूस मत होने देना 
उस मासूम अश्क को।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, September 29, 2022

{३५८} तुम सम्हले नहीं





तुम्हें याद है
पिछली बार तुम कब ठिठके थे 
अपने अंतःकरण के द्वार पर,

कब खोली थी
साँकल तुमने
अपने अंतर्मन की,

कब बजे थे 
कुछ शब्द 
तुम्हारे कानों में 
घण्टियों की तरह,

और तुम 
लड़खड़ाए थे 
संभल जाने को,

तुम सम्हले नहीं,
आजतक उसी तरह 
लड़खड़ा रहे हो,

तुम्हारी यह लड़खड़ाहट 
शायद तुमसे चिपकी ही रहेगी,
दीवार पर चिपके,
किसी इश्तिहार की तरह। । 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, September 27, 2022

{३५७ } गति और नियति





घर मे दीवारें हैं 
दीवारों मे बन्द खिड़कियाँ हैं 
बन्द खिड़कियों से 
टकराकर अपना सर 
लहूलुहान पड़ी है 
मेरी संवेदना। 

संवेदना ही आरोपित है 
संवेदना ही अपराधी है 
संवेदना ही प्रताड़ित है 
संवेदना ही दण्डित है। 

आरोप सह कर 
प्रताड़ना सह कर 
और दण्ड भी सह कर 
मेरी संवेदना अभी भी ज़िंदा है,
क्योंकि यही उसकी गति है,
और यही उसकी नियति है।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, September 25, 2022

{३५६ } लौट कर नहीं आते कभी ये






ठहरता नहीं कोई पल 
ठहरता नहीं कोई कल 
ठहरता नहीं बहता हुआ जल 
ठहरती नहीं हवा की हलचल 
क्यों देख कर रहा है मचल
क्यों हो रहा है यूँ बेकल  
लौट कर नहीं आते कभी ये 
पल, कल, जल और हवा की हलचल। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, September 22, 2022

{३५५ } हम चमन-चमन इश्क बोते हैं





हम चमन-चमन इश्क बोते हैं 
फिर उन्हे आँसुओं से भिगोते है। 

गगन को सजाता हूँ मोहब्बत से 
फूल, सूरज, चाँद-चाँदनी होते हैं। 

मौसमों के रुख बदलने के लिए 
हम परवाज़ पर तूफान ढ़ोते हैं। 

सूरज की तपिश से पड़ी खरोंचें 
हम उसको शबनम से ही धोते हैं। 

हाथों की लकीरें हम खुद बनाते 
वो और होंगे जो किस्मत पे रोते हैं। 

..  गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, September 21, 2022

{३५४ } हम उनसे मिलना चाहते हैं





हम उनसे मिलना चाहते हैं 
जो कम से कम 
यह जानते हैं 
कि वे कुछ नहीं जानते 
हम उनसे कतई नहीं मिलना चाहते 
जो अपनी जानकारी को ही 
विज्ञान मानते है। 

हम उनसे मिलना चाहते हैं 
जो कुछ कहना 
और कुछ करना भी जानते है 
हम उनसे कतई नहीं मिलना चाहते 
जो बिना चले ही 
बस सिर हिलाते हैं। 

हम उनसे मिलना चाहते है 
जो जीने की खातिर 
साँसों का साथ देते हैं 
हम उनसे कदापि नहीं मिलना चाहते 
जो सिर्फ साँसों को ही 
जीना समझ लेते हैं। 

.. गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, September 19, 2022

{३५३ } जीवन का यही ताना-बाना




फ़ूल खिलते हैं 
सूख जाते हैं 
झर जाते हैं,

काँटे भी मिलते हैं 
चुभते हैं 
बिखर जाते हैं,

सुख आता है 
सुख जाता है 
रुकता नहीं है,

दुख भी आता है 
दुख जाता है 
पर रहता नहीं है,

जीवन का यही नियम है 
जो आज यहाँ है 
वो कल जाने कहाँ हो,

मिलना और बिछड़ जाना 
फिर से मिलना 
और फिर से बिछड़ जाना,

जीवन का यही ताना-बाना।
जीवन का बस यही ताना-बाना।। 

.. गोपाल कृष्ण शुक्ल