
अहम की भ्रान्ति को सत्वर मिटा कर
भाव मे सदभाव को आवास देकर
मनुज को देवत्व का संधान दे दो ।


बन्द जुबाँ से क्या कुछ भी पता लगता है,
जख्म दिल पर रोज एक नया लगता है।
बिजलियाँ गिरी हैं मोतबरी की मीनारों पर,
उदासियाँ साथी है, चमन पराया लगता है।
अजब सा सन्नाटा है, दहशत गूँजा करती है,
सजी महफ़िलों मे अपना दिल कहाँ लगता है।
ज़िन्दगी में भी अब ज़िन्दगी जैसे तेवर नही,
ज़िन्दगी तो है, पर कुछ सूना-सूना लगता है।
तमाम दर्द अपने सीने में ही छुपाये हुए हूं,
सबके सामने मुस्करा देने मे क्या लगता है।
नजदीकियों मे भी तनहाइयाँ रास आने लगीं
आदत हो गयी, बस एक दो रोज बुरा लगता है।
नये दौर का सफ़र है, नया सबेरा, उजियारा है,
अपने दिन ढल गये, सब अँधियारा लगता है ।
.............................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

नफ़रतों की आग में मेरी मोहब्बते रख दी गयीं,
मेरे हिस्से में उदासियाँ ही उदासियाँ रख दी गयी।
अब गुमसुम सा बैठा हूँ, आँसू पलकों पर ठहरे है,
दिल से दूरी नही पर कुछ मजबूरियाँ रख दी गयी।
उसके ख्वाबों के बगैर अब राहें कटती नही दम भर
मंजिल की अजानी राहों पर ही दूरियाँ रख दी गयीं।
जाने क्यो उसने मेरे दिले-मासूम के साज को तोडा
सजी हुई महफ़िल में फ़िर खामोशियाँ रख दी गयी।
लाख हँस-बोल लें, दिल में आँसू हैं, गम है चेहरे पर,
दर्द के फ़ूलों से सजा करके, तनहाइयाँ रख दी गयी।
दिन की हकीकतें हैं क्या और रातों के ख्वाब हैं क्या,
मेरी उलझी हुई ज़िन्दगी मे, तारीकियाँ रख दी गयीं।
................................................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल

यहाँ की रौनकें अब अपने लिये तो रही नही, चलो कहीं और चलें,
यहाँ फ़ागुनी बयार नहीं, पतझर का मौसम है, चलो कहीं और चलें।
इस मतलबी जहाँ में तो सभी है अपनी पाक-मोहब्बत के ही दुश्मन,
अरे ! चलो छोडो इस मतलबी जहाँ को, आओ चलो कहीं और चलें।
ये जमीं भीगी है गम की आँखों के आँसुओं से, बेबसी की इन्तिहा है,
ये जंगल है बबूलों का यहां कोई गुलशन नही, चलो कहीं और चलें।
हम अंजुमनआरा हुआ करते थे कभी उनकी सजाई हुई महफ़िलों के,
अब मिलना तो दूर मिलने की आरजू भी नही, चलो कहीं और चलें।
इस जहाँ में मोहब्बत नही मेला है, किसी को किसी से क्या लेना देना,
दिन ढलते हर शख्स अपनी-अपनी राहों पे होगा, चलो कहीं और चलें।
ये कैसा शहर है, न धुआँ है, न शोला है, न मंजिल ही है, न ही है रास्ता,
न कहीं भी छाँव दिखाई देती, पूरे शहर में अंधेरा है, चलो कहीं और चलें।
आसमान अभी भी काला नही, चाँदनी से अभी कुछ-कुछ उजाला बाक़ी है,
अभी पहुँच ही जायेंगे अपने ख्वाबों की मंजिल तक, चलो कहीं और चलें।
अपनी मोहब्बत का खजाना तो लुट चुका कैसे हम दिल की हिफ़ाजत करें,
अपनी आँखों से ख्वाबों को जुदा करके, ऐ ज़िन्दगी ! चलो कहीं और चलें।
........................................................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल

कितना दिलकश है तेरा ये हुस्न-ए-शबाबी
बडी मादक हैं तेरे ये चश्म-ए-आफ़्ताबी
हसीन हैं तेरे ये होठ नीलोफ़रे-माहताबी
नाजुक गुल से है तेरे ये दस्त-ए-गुलाबी
रुख पर उतर आया हो जैसे रंग-ए-शहाबी
तुम हुस्न-ए-मुजस्सम हो, तुम हो हुस्न-ए-सादगी
तुम हुस्न-ए-फ़िरंगी नही, तुम हो जमाले-खुदाबन्दी
भौंचक है हर शख्स देखकर तेरा ये आबो-ताबी
तेरे हुस्न में ऐसा उलझा हुआ हूँ मै
कि अब तो जमाना भी समझे है मुझको शराबी ।
............................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


तस्लीम कर रहा हूँ मोहब्बत मैं आपकी
चाहता हूँ उम्र भर हिफ़ाजत मैं आपकी।
होना नही है रूबरू दुनिया से अब मुझे
रहूँगा बनके जानेजाँ उलफ़त मै आपकी।
मेरी नज़र मे प्यार की भाषा को देखिये
कर दूँगा दूर सारी शिकायत मैं आपकी ।
दीदार आपके प्यार का होता रहे अगर
बन जाउँगा एक दिन जरूरत मैं आपकी ।
मुद्दत से कर रहा हूँ मैं आपका इन्तज़ार
सौपूँगा आप ही को अमानत मैं आपकी ।
............................................................ गोपल कृष्ण शुक्ल
