Sunday, October 1, 2017
Tuesday, May 2, 2017
{३४३} बिगड़ी नियति की चाल
फ़ैलाया कहाँ तक जाल।
सूखते ही जा रहे हैं क्यों
सब झील नदी और ताल।
परिन्दे को पता ही नहीं
बिगड़ी नियति की चाल।
कु्छ चँद निवालों के लिये
उसकी ही खिंचेगी खाल।
फ़िर उड़ेगा या कि मरेगा
बड़ा ही कठिन है सवाल।
पिंजरे में हुआ बन्द नसीब
जीस्त का नहीं पुरसाहाल।
वाह रे मालिक ! तेरी वाह
ज़िन्दगी दी है बड़ी कमाल।
................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल
Sunday, April 30, 2017
{३४२} चढ़ गई मोहब्बत परवान
कर दूँ ये जान तक कुर्बान है।
इश्क का सम्मान करेगा वो ही
जिंदा जिस शख्स में इंसान है।
इश्क का तज़ुर्बा हुआ उसे भी
चाहत से वो कब अनजान है।
हाय रे कातिल अदा की नज़र
न कहो कि वो अभी नादान है।
यूँ तो न दूर जाइये ऐ नाज़्नीन
वस्ल का पल रहा अरमान है।
........................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल
Tuesday, April 25, 2017
Thursday, April 20, 2017
{३४०} नज़रों से दरकिनार मत करना
या इश्क का किरदार मत करना।
गिरा दो ये नफ़रतों के ऊँचे महल
नादान दिलों में दरार मत करना।
नादानियों में खो न जाऊँ कहीं
नज़रों से दरकिनार मत करना।
मँज़िलें ख्वाब बन कर न रह जाएँ
ऐसे वक्त का इन्तज़ार मत करना।
दिल की लगी को दिल ही जाने
दिल को कभी बेकरार मत करना।
................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल
{३३९} ज़ख्म की ज़ख्म ही दवा है
ज़ख्म की ज़ख्म ही दवा है।
उसके जाने का न हो दर्द
दिल पे पत्थर ही रखा है।
ज़ख्म दिखा के क्या फ़ायदा
यहाँ पे मुस्कुराना ही भला है।
शायद वो कभी आ ही जाएँ
दिल का दरवाजा भी खुला है।
लाश की मानिन्द हो गया हूँ
ज़िस्म है पर जान ही ज़ुदा है।
.................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल
Friday, March 24, 2017
{३३८} डगर जीवन की
झाँकूँ अतीत के झरोखों से, थकन मिटाऊँ विश्राम करूँ।
खूब लड़ चुके हम झूठ-फ़रेब से और माथे की लकीरों से
कब तक रहूँ ऐसे जग में, हम यूँ अनजान फ़कीरों से।
छूट गये खेल लुका छिपी के, सुधियाँ हुईं बिसराई सी
कब तक शर्म का पर्दा ओढ़े, साँसें सिमटें सकुचाई सी।
खोये लहलहाते बाग-बगीचे खोई महकती अमराई भी
जाने कब ये बचपन बीता, अब बीत चली तरुणाई भी।
अब कुछ उजले से, कुछ मटियाले, बीते पलों के साए हैं
फ़िर उधड़ी है बखिया यादों की बरबस ही आँसू आए हैं।
............................................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल
Saturday, March 18, 2017
{३३७} होली
दूरियाँ सब मिटाओ, मजा आ जाए।
किसी को छोटा या बड़ा समझो नहीं
खूब रँगो और रँगाओ, मजा आ जाए।
रँग में ऐसे रँग को जमकर मिलाना
भूले अपनो-पराओ, मजा आ जाए।
रँग-गुलाल डालो या न डालो, मगर
जरा सा मुस्कुराओ, मजा आ जाए।
लाख जतन करूँ मगर उतर न सके
रँग इश्क का चढ़ाओ, मजा आ जाए।
.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल
Wednesday, March 15, 2017
{३३६} सत्य क्या है?
सत्य क्या है?
क्या दृश्य ही सत्य है,
और अदृश्य असत्य?
या फ़िर,
दोनो ही सत्य हैं?
बहुत उलझा हुआ है प्रश्न
और शायद अनुत्तरित भी।
जो दृश्य है,
उसके होने पर सन्देह नहीं,
उसका होना सत्य है,
परन्तु,
जो दृश्य नहीं
उसे असत्य तो नहीं कह सकते।
शायद,
दृश्य और अदृश्य
दोनो ही सत्य हैं।
क्योंकि,
दृश्य स्वयं दिखता है
और अदृश्य
अपनी अनुभूति कराता है।
परन्तु,
शाश्वत सत्य क्या है?
खोज अभी जारी है
और प्रश्न भी अनुत्तरित।
बुद्धि का व्यायाम
खोल सके शायद कभी
रुद्ध द्वार को,
और पा सकूँ उत्तर
कि
सत्य क्या है।।
.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल
Monday, March 13, 2017
{३३५} ज़िन्दगी गीत है
बस,
सुर कभी ऊँचे,
कभी मद्धिम होते रहते हैं।
सुर कैसा भी हो,
गीत नहीं रुकना चाहिये।
लय कैसी भी हो,
गीत नहीं रुकना चाहिये।
ताल कैसी भी हो,
गीत नहीं रुकना चाहिये।
ज़िन्दगी गीत है गाओ
और गाते जाओ,
ज़िन्दगी गीत है गुनगुनाओ
और गुनगुनाते जाओ।
ज़िन्दगी गीत है।
ज़िन्दगी गीत है॥
.................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल
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