Sunday, June 2, 2013

{ २६४ } तुम्हे न भुला पायेंगें





तुमने हमें भुला दिया, हम न तुम्हे भुला पायेंगे
लगी है आग जो दिल में, कैसे उसे बुझा पायेंगे।

तेरी अदाओं और आँखों का नशा बसा जेहन में
तेरे इस सुरूर को हम हरगिज़ न छुडा पायेंगे।

तन्हा हो गई हैं अब मेरे दिल की तन्हाइयाँ भी
तुम्हारी इस जुदाई को हम कैसे मिटा पायेंगे।

हर शाम गुजर जाती है अब किसी मयखाने मे
बन गया हूँ रिन्द, पैमाना अब न हटा पायेंगें।

गुमनामियाँ ही अब मेरा ठिकाना बन चुकी है
दुनिया के लिये हम अजनबी कहला जायेंगें।


-------------------------------------- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Monday, May 27, 2013

{ २६३ } बातें





अब न अच्छी लगती प्यार की बातें
ये सब अब हैं लगती बेकार की बातें।

आसमाँ-चाँद-सितारे, गुलो-चमन से
बढ कर अब हो गईं तकरार की बातें।

जाने क्योंकर बदली सबकी फ़ितरत
रह गईं बाकी केवल बेजार की बातें।

दिल पर लगती चोट पर बन्द न होती
आपस की ये बेकार-तकरार की बातें।

बेरँग चेहरों से भरी हुई इस बस्ती मे
बाकी बच गईं केवल बीमार सी बातें।

------------------------------------ गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ २६२ } इश्क का इजहार






हुस्न से इश्क का इजहार कर दिया
खुद को हुस्न का बीमार कर दिया।

हुस्न की मदभरी नज़र के जाम ने
बाहवास को मय-खुमार कर दिया।

छम से आके दिल के सूने आँगन में
हुस्न ने इश्क का श्रृँगार कर दिया।

शहनाई के स्वर, मधुमासी गीतों ने
पतझर को मौसमे-बहार कर दिया।

रहगुज़र पर खिल गये सुर्ख गुलाब
दिल को महकता गुलजार कर दिया।


............................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Sunday, April 21, 2013

{ २६१ } जी लें सुख के दो चार पल






आओ सजनि, जी लें सुख के दो चार पल

समय ने बढाईं जो दूरियाँ अब टल रहीं
विषम-विवशतायें हाथ अपने मल रहीं
सुधियों ने, सरोवर में खिलाये है कमल
आओ सजनि, जी लें सुख के दो चार पल।।१।।

छोड दें ये झंझावात की गहन परछाइयाँ
आओ नापें बढ कर व्योम की ऊँचाइयाँ
अब न पास आने दें विषम-विकल पल
आओ सजनि, जी लें सुख के दो चार पल।।२।।

रच गये हैं मिलन के छन्द गाने के लिये
संगीतमय पल प्राणों में सजाने के लिये
आओ गुनगुनायें हम इन्हे मचल-मचल
आओ सजनि, जी लें सुख के दो चार पल।।३।।


.................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल



Saturday, April 6, 2013

{ २६० } उदास मन






मन,
बहुत उदास है आज,
पर उसने
अपने शरीर को
उजले आवरण से
ढँक रखा है,
अपने चेहरे पर
चिपका ली है
एक बीमार सी मुस्कान
और खोज रहा है
मन के कँटीले बियावान में
सौगँधित सुमनों के बागीचे को।।

.................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, April 3, 2013

{ २५९ } हसीन शाम






कितनी हसी्न खिली है शाम
आओ टकरायें जाम से जाम।

लब भी गुनगुना उठे प्यार से
बताओ ऐसा कोई प्यारा नाम।

लौटॆं फ़िर से प्यार की खुश्बूयें
डूबे रँगीनियों में सुबहो-शाम।

टकरा कर गुलों की खुश्बू से
ऋतुयें भी करें हमको सलाम।

जो कम करे दिलों के बोझ को
ऐसे गमों से लें हम इन्तकाम।


...................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Sunday, March 31, 2013

{ २५८ } आई है मिलन की रात






देख मेरा प्रेम में महकना
भूल गये तारे भी छिपना
दिल भी भूल गया है घात
आओ सजनि ! आई है मिलन की रात।।१।।

आओ मिल कर गाये राग मल्हार
छा जायेगी फ़िर से जीवन में बहार
सजनि आओ करे कुछ बात
आओ सजनि ! आई है मिलन की रात।।२।।

खुशियों के दिन दूर नही हैं
मुझको अब मंजूर नहीं है
सजनि तेरे नयनों की बरसात
आओ सजनि ! आई है मिलन की रात।।३।।

भँवरा मन ही मन झूम रहा है
कलियों का मुख चूम रहा है
खिल उठा है हर गुल हर पात
आओ सजनि ! आई है मिलन की रात।।४।।


.............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

Friday, March 29, 2013

{ २५७ } आशाओं के दीप जलाओ






आशाओं के दीप जलाओगे जब
चहुँ ओर प्रकाश ही प्रकाश होगा।

यदि टूट गये हों सपने तो क्या
यदि छूट गये हों अपने तो क्या
सबके सब चलते अपनी राहों पर
उजियारी- मतवारी चाहों पर।

पर राहों मे फ़ूल बिखराओगे जब
चहुँ ओर सुगन्ध-सुवास होगा।।१।।


मौसम भी तो बदले तेवर
दिशाहीन हो उडते कलेवर
रक्त गँध पूरित हवायें आती
छाती को चीर-चीर कर जाती।

पर बसन्त के गीत गुनगुनाओगे जब
चहुँ ओर मन-मुदित मधुमास होगा।।२।।


कल क्या होगा किसने देखा
क्यों डाल रहे माथे पर तिरछी रेखा
कामना ही सबको यहाँ छलती है
वर्तिका वेदना की ही जलती है।

पर प्रेम का संगीत बजाओगे जब
चहुँ ओर प्रेम-हास-परिहास होगा।।३।।


............................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Thursday, March 28, 2013

{ २५६ } बीती सुधियाँ






तट पर नदी के बैठे हुए नदी को जी भर देखते रहना
बीते दिनों की सुधियों को फ़िर नदी की धार से कहना।।

याद है वो पीपल की छाँव जहाँ हम-तुम
कभी बैठे हँसते हुए कभी रहे गुमसुम
वहाँ की सुधि पूछे तुम्हारी बेरुखी का कारण
कहता न कुछ भी बस देखता नदी का बहना।

तट पर नदी के बैठे हुए नदी को जी भर देखते रहना
बीते दिनों की सुधियों को फ़िर नदी की धार से कहना।।१।।

लिखे थे नाम उँगलियों से रेती पर जहाँ तुमने
डुबोये पाँव जहाँ पानी में उलीचा जल वहाँ हमने
तुम्हारे धार में उतरने की चपलता में रहे हम खोए
विस्मृत न होती है तुम्हारी देह से नदी का दहना।

तट पर नदी के बैठे हुए नदी को जी भर देखते रहना
बीते दिनों की सुधियों को फ़िर नदी की धार से कहना।।२।।

तैरता है जोड-बाकी सा विगत का अनुभव
नीड मे सोया हुआ है स्वप्न का कलरव
खूबसूरत स्वप्न में जब भी डूबता है मन
रुला देती मगर पल में विछोह का सहना।

तट पर नदी के बैठे हुए नदी को जी भर देखते रहना
बीते दिनों की सुधियों को फ़िर नदी की धार से कहना।।३।।


............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, March 27, 2013

{ २५५ } क्या थे इरादे और क्या कर चले





जाने क्या-क्या थे इरादे और क्या कर चले
जाने क्यों खुद को खुद से ही जुदा कर चले।

गुलजार चमन को उजाडने वाले कह रहे है
कहाँ अपने ही गुलशन को भुला कर चले।

सुकूँ मिल ही जायेगा इन काँटों की सेज पे
गुले-खुदगर्जी की सेज को ठुकरा कर चले।

गुनहगार हूँ जमाने का या कि मोहब्बत का
राह चले वफ़ा की पर ज़फ़ा कमा कर चले।

सपने बुनते-बुनते ही चकनाचूर हुए सपने
गमज़दा दिल मे टूटे सपने सजा कर चले।


........................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल