पाँखुरी

Sunday, March 29, 2015

{ ३०४ } रात ढ़ली जाती है

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चढ़ी हुई रात यूँ ही ढ़ली चली जाती है साथ ज़िगर को भी चीरे चली जाती है। कल तलक थी जो साथ में ही मेरे, आज हर सूँ देखा कहीं वो नज़र नही...
Tuesday, March 24, 2015

{ ३०३ } सन्नाटा

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चारो तरफ़ घुप्प अँधेरा वातावरण में गूँज रहे हैं चीटियों से फ़ुसफ़ुसाते शब्द अचानक एक किरण सी चमकती पर ऐसा क्यों लगता है कि अभी सब क...
Saturday, March 7, 2015

{ ३०२ } हमें तुमसे बहुत प्यार है

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ओ नाजनीन हमें तुमसे बहुत प्यार है पर जमाना बना हुआ बीच मे दीवार है। ये हमारे प्यार की ही मजबूत नींव है होती रहती जो कभी-कभ...
Monday, February 23, 2015

{ ३०१ } चन्द्रमा की आग

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अब सहन नहीं होती सूरज की तपन और यह चन्द्रमा भी तो आग उगलने लगा है शायद.......... दोनो में कोई गुप्त समझौता हो गया है। कहाँ जायें...
Saturday, January 31, 2015

{ ३०० } प्रलय की भूमिका

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निर्माण जिसे तू कहता फ़िरता मूरख ! वह भूमिका तो प्रलय की है............. अपनी सुविधा में लगे हुए चिल्लाते हो कहते ये माँग आज के सम...
Wednesday, January 21, 2015

{ २९९ } दुख दर्द ही बचे मेरे मुकद्दर में

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ये दुख दर्द ही बचे मेरे मुकद्दर में हैं हो गया गम का बसेरा मेरे घर में है। खुशियाँ भी पास आती तकल्लुफ़ से मेरा मस्कन जो गहरे समन्द...
Saturday, January 10, 2015

{ २९८ } पर, प्रियतम तुम कभी न आये

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पर, प्रियतम तुम कभी न आये। स्मृति पट पर अब तक मैंनें जाने कितने ही चित्र बनाये, कितनी बार नयन के घन से पीड़ा के अँकुर सरसाय...
Monday, January 5, 2015

{ २९७ } बूढ़ा मन काँपने सा लगता है

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कँगूरों पर जब शाम उतर आती है ये बूढ़ा मन काँपने सा लगता है.........। खुशियों के चमन के फ़ूलों की पाँखे काँटों से सजी सेज हो जाती है...
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Sunday, January 4, 2015

{ २९६ } मोहब्बत की गहराइयाँ

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मोहब्बत में छिपी गहराइयाँ देखो झूठ मे दफ़न हुई सच्चाइयाँ देखो। दिल की दहकती आग दबती नहीं नकाब में छिपी रुसवाइयाँ देखो। खामोश रात...
1 comment:
Tuesday, October 28, 2014

{ २९५ } तेरी याद आई है

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होठों का बेवक्त हँसना जुल्फ़ों का बार-बार बिखरना ख्वाबों में डुबो कर मुझे नींद का कोसों दूर चला जाना खुश्बू की मंद-मंद बयार का चल...
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गोपाल कृष्ण शुक्ल
खुश रहो !!! मस्त रहो !!!
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