Monday, November 7, 2022

{४०३} तेरे ही इंतज़ार सी हुई ज़िन्दगी





रूठी रूठी बहार सी हुई ज़िन्दगी 
टूटी टूटी पतवार सी हुई ज़िन्दगी। 

न रोशनी है न जलता  हुआ चराग 
उजड़ी टूटी मजार सी हुई ज़िंदगी। 

न मँजिल, कारवाँ न  हमराही कोई 
उड़ते  हुए  गुबार सी  हुई ज़िन्दगी। 

जब  से  जुदा  हुए हम - आप सनम 
फुरकत मे गुनहगार सी हुई ज़िंदगी। 

हम रब से क्या माँगें खुद अपने लिये 
एक तेरे ही  इंतज़ार सी हुई ज़िन्दगी। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 


फ़ुरकत = वियोग 

Saturday, November 5, 2022

{४०२ } देने वाले ने क्या ज़िन्दगी दी है





देने वाले ने  क्या  ज़िन्दगी दी है 
क्यों  मेरे साथ  दिल्लगी की है। 

हम ने  बरसों  जिगर जलाया है 
फिर कहीं दिल में रोशनी की है। 

आप से दोस्ती का  एक हासिल 
सारी दुनिया से  दुश्मनी की है। 

लोग  मरते हैं  ज़िन्दगी के लिये 
हमने मर मर के ज़िन्दगी जी है। 

हम  को तो मारा  है ज़िन्दगी ने 
लोग कहते हैं  खुदकुशी की है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, November 3, 2022

{४०१ } अक्सर ध्यान तुम्हारा आता है





अब भी अक्सर ध्यान तुम्हारा आता है
देखूँ ? गुजरा  वक्त  दोबारा  आता है। 

आह नहीं आती है अब तो होंठों तक 
सीने में   बस  एक  अँगारा  आता है। 

जाने किस दुनिया में सोती जागती है 
जिन आँखों में ख्वाब तुम्हारा आता है। 

दिन भर परिंदों की आवाजें  आती हैं 
रात को घर में जंगल सारा  आता है। 

रातों मे  जब  चाँद - चाँदनी आते हैं 
याद  बहुत  तेरा  रुखसारा आता है।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, November 2, 2022

{४०० } नींद हैं और न हैं ख्वाब





नींद हैं और न हैं ख्वाब 
ये कैसी पिलाई शराब। 

दिल में  वीरनियाँ  बसीं 
हैं खटकते गुलो गुलाब। 

अश्कों ने उम्र भर लिखी 
मेरे ही गमों की किताब। 

सह न पाओगे तुम कभी 
मेरा ढ़लता हुआ शबाब। 

आँखों-आँखों में ही मिला 
मुझे  सवाल  का जवाब। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३९९} साया कहाँ गया





पूरी तरह से सच कभी  ये बताया कहाँ गया 
होते  ही गुम  उजाले के  साया  कहाँ  गया। 

कट कर दरख्त छत बनी, साये की चाह में 
लेकिन कोई भी पेड़ फिर लगाया कहाँ गया। 

जिद थी जिन्हे  बुझाने की  जलते हुए  चराग 
कोई चराग  फिर उनसे  जलाया कहाँ गया। 

मैं बन - सँवर के बैठा  रहा सारी  शब मगर 
ख्वाबों में  तेरे मुझ  को बुलाया  कहाँ  गया। 

ये जान भी हाजिर है  सनम आप की खातिर 
कहते सब हैं पर कभी ये निभाया कहाँ गया। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, November 1, 2022

{३९८} मेरी भी अजब कहानी





मेरी भी अजब कहानी। 
जैसे हो पीर पुरानी।। 

मैं चला निरंतर अन्तर में विश्वास भर 
सूखी-सूखी आँखों में अतृप्त प्यास भर 
न पहुँच सका तुझ तक कभी भी 
छोड़े पथ पर चरण निशानी। 
मेरी भी अजब कहानी।। 

अर्थ क्या शब्द ही रहे अनमने 
खिंचे-खिंचे से और रहे तने-तने 
मीठे-मीठे बोलों मे खारे-खारे से 
वेदना अश्रु बने पानी-पानी। 
मेरी भी अजब कहानी।। 

उजियारी रातों मे अंधियारा जैसे 
छाई काली घटा छँटेगी कैसे 
दीन दृगों में आँसू ही आँसू 
कौन सुने करुणा की वाणी। 
मेरी भी अजब कहानी।। 

                                                                                            -- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, October 31, 2022

{३९७} मेरा परिचय क्या





मैं क्या, 
मेरा परिचय क्या। 

प्रभु सत्ता से भिन्न 
मेरी अपनी सत्ता क्या। 

ये जीवन, जीव-मरण का अभिनय है, 
सुकर्म, मनुज-जीवन की यज्ञ-आहुति,
परमार्थ, मनुज-जीवन का है तर्पण,
सत्य-पथ से न हो तुम विचलित, 
रहो अग्रसर धर्म-पथ पर,
तन-मन-धन सब कर दे अर्पण,
तू क्या,
तेरा परिचय क्या। 

मैं क्या, 
मेरा परिचय क्या।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, October 30, 2022

{३९६ } तुम्हारे इंतजार में





वापस जाते हुए 
चूमना था तुम्हें,
अपनी आँखों से 
ओझल होने तक 
देखना था तुम्हें,
होंठों की बुदबुदाहट 
बन्द होने के पहले 
कहने थे कुछ शब्द,
गिनना था अँगुलियों पर 
अपनी अगली मुलाकात का 
लम्बा दुखदायी अन्तराल। 


अचानक आँखों से 
दो आँसू टपके 
और तुम यकायक 
आँखों से ओझल हो गयी। 

मैं आज भी 
वहीं अनथक बैठा हूँ,
सिर्फ तुम्हारे इंतजार में।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Saturday, October 29, 2022

{३९५ } ज़िन्दगी दर्द भी है खूबसूरत भी





अदावत भी  है और मोहब्बत भी 
ज़िन्दगी  दर्द भी है  खूबसूरत भी। 

शबे-रोज  पढ़ता हूँ  तुम्हारी आँखें 
ये शरारत भी है और मोहब्बत भी। 

ज़िन्दगी में  गर दो-चार ग़म मिले  
वो नसीहत भी है और हिम्मत भी। 

माँ का आँचल है  अपना आसमाँ  
यही इनायत भी और इबादत भी। 

यूँ ही फ़कीरी में तेरे गुण गाता रहूँ  
यही मोहब्बत भी यही इबादत भी। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, October 27, 2022

{३९४ } तुम पर है जाँ निसार





तुम पर है जाँ निसार 
कर लो अब एतबार। 

फिरता हूँ मैं भटकता 
कब से हूँ मैं बेकरार। 

तिशनगी रूह की मिटे 
आ बन कर वो फुहार। 

हो गई दर्द की इंतिहा 
सुन ले दिल की पुकार। 

जिंदा रहे मेरी मोहब्बत 
खत्म कर मेरा इंतजार। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल