Saturday, October 15, 2022

{३७५ } कल का इंतजार





न जाने कितने कल 
आ कर बीत गए 
और कितने ही आज 
जो वर्तमान थे 
वो सारे कल में बदल गए 
पर मैं 
आज भी न जाने 
किस कल के इन्तजार में 
अपने वर्तमान को 
आज से कल में 
बदलने को आतुर हूँ 
यह सिलसिला निरंतर 
चलता ही रहेगा। 
चलता ही रहेगा।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३७४ } लफ़्ज़ लफ़्ज़ कराह रहा





हिज़्र में उसकी जल रहे 
प्राण हैं जैसे निकल रहे। 

जो भटकते रहे उम्र भर 
वो कदम नहीं सँभल रहे। 

दर्द मुझसे कभी न दूर थे 
आस-पास ही टहल रहे। 

लफ़्ज़ लफ़्ज़ कराह रहा 
दीदा-ए-नम मचल रहे। 

उखड़ रही अब साँस भी 
यूँ सिसकियों में पल रहे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३७३} समय





ये कैसी है 
आफत..........

हर तरफ है 
नफरत ..........

खो गई है 
इशरत ..........

आँखों में बसी 
हिकारत ..........

बची नहीं 
अनारत ..........

कोई तो निकले 
सूरत ..........

फ़िर से हो 
मोहब्बत ..........।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 


इशरत = आनन्द 
हिकारत = घृणा 
अनारत = अनुरक्ति, प्रेम 


Friday, October 14, 2022

{३७२ } नया जगमगाता स्वर्णिम सबेरा





जहाँ है अक्स ग़म का 
वहाँ होगा जरूर खुशियों का चेहरा,
जहाँ है हँसने पर बंदिशें 
वहाँ होगा जरूर रोने पर पहरा,
जहाँ ज़िन्दगी में है गहरा अँधेरा 
वहाँ छुपा होगा जरूर स्वर्णिम सबेरा,
जहाँ छिपा है अज्ञान और असत्य 
वहाँ होगा जरूर गूढ़ ज्ञान और सत्य। 

फिर क्यों मनुष्य निराशा को 
इस कदर करता है 
हावी अपने मन पर,
यह जानते हुए कि 
होता है हर अँधेरे के बाद 
नया जगमगाता स्वर्णिम सबेरा। 
नया जगमगाता स्वर्णिम सबेरा।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३७१ } अपनों को कभी मत भुलाओ





कौतुहल हैं मन में अनेक,
उठते संशय भी दो-एक,
हम एक गाँठ खोलते 
गुत्थियाँ उलझ जाती अनेक। 

अपनों को ठुकराना,
गैरों को गले लगाना। 

अपनों से है बैर 
गैरों की पूँछें खैर। 

अपनों के आने से उदास,
गैरों के स्वागत में उल्लास। 

अपने हो गये पहेली,
गैरों से होती अठखेली। 

धुंध भरा काला साया,
मन में सबके छाया। 

पर, मैं तो बस यही कहता 
वक्त कैसा भी आए सामने 
अपना किरदार कभी मत गिराओ। 
अपने से अपनों को कभी मत भुलाओ।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, October 13, 2022

{३७० } दुश्वारी ही दुश्वारी है





दुश्वारी ही दुश्वारी है 
जीना भी लाचारी है। 

करता है मुझे याद 
उससे मेरी यारी है। 

खुशियों का हो चमन 
कितनी जिम्मेदारी है। 

इश्क हम कैसे करते 
क्या औकात हमारी है। 

मतलब से मतलब रखना 
कहलाती होशियारी है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, October 11, 2022

{३६९} तुम कविता हो





तुम कविता हो। 
कविता तेरे होंठों की लाली 
कविता तेरी चाल मतवाली 
कविता तेरी मन्द मुस्कान 
कविता जिस पर मैं कुर्बान 
तुम सरिता हो। 
तुम कविता हो।। 

कविता तेरे नूपुर की रुनझुन 
कविता तेरे मानस की गुन-गुन 
कविता तेरा मुझसे रूठ जाना 
पहले इठलाना फिर मान जाना 
तुम रूप-गर्विता हो। 
तुम कविता हो।। 

कविता तेरी तिरछी नज़र है 
चीर जाती जो मेरा जिगर है 
ईश्वर की अद्भुत रचना हो 
कवि की कोमल कल्पना हो 
तुम देव-निर्मिता हो। 
तुम कविता हूँ।। 

                                                                                            -- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, October 10, 2022

{३६८ } आजादी गीत






गली गली में बजते देखो आजादी के गीत 
जगह जगह झंडे फहराएं यही पर्व की रीत 
बहे पवन, परचम फहराए, याद दिलाए जीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

आजादी तो मिली किन्तु क्या वाकई आजाद हैं 
भूले जनमानस को नेता अनसुनी फ़रियाद हैं 
मंहगाई कि मारी जनता, भूल गई ये जीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

हमने पाई आजादी, भाग गए गोरे-अंग्रेज 
किन्तु बटवारे की पीड़ा, दिल में अब भी तेज 
भाई हमारा हुआ पड़ोसी, भूल गए सब प्रीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

योगी हम अपनी ही धुन के, सदा चमकता भाल 
देश ध्वज उठा हाथों मे, दशा देश कि रहे संभाल 
हर पल में याद रहे बस, अपना गौरवपूर्ण अतीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

दिया हमारे वतन का, जलता रहे सदा 
पौधा आजादी का, फलता रहे सदा 
कर्जा अभी बड़ा है, हुआ अभी न वीत। 
गली गली में बजते देखो आजादी के गीत।। 

                                                                                        -- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

( वीत = मुक्त )

Sunday, October 9, 2022

{३६७ } हम न लड़खड़ाते हैं





दाँव पर अपने दिल को हम लगाते है 
चाहते हैं जिन्हे, उन्ही से मात खाते हैं। 

आगे-पीछे खाई है, बचें तो हम कैसे बचें 
चलो इस मुसीबत में मुकद्दर आजमाते हैं। 

हम हँसते खुशियों में खिलखिला कर खूब 
और मुश्किलों में भी हम यूँ ही मुस्कुराते हैं। 

बुझाते थे कभी दूसरों के घरों की आग को 
आज अपने घर की आग से दामन जलाते हैं। 

पाँव में पड़ी हैं मजबूरीयों की कड़ी-बेड़ियाँ 
मस्त चल रहे फ़िर भी हम न लड़खड़ाते हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Friday, October 7, 2022

{३६६ } दास्ताने-ग़म किसी को क्या सुनाऊँ





कितने पिये दर्द के आँसू क्या बताऊँ 
दास्ताने-ग़म किसी को क्या सुनाऊँ। 

रिश्तों के आईने में पड़ चुकी हैं दरारें 
आईने से चेहरा अपना कैसे छुपाऊँ। 

चारों तरफ से चल रही हैं तेज हवाऐं 
इन आँधीयों के बीच दीप कैसे जलाऊँ। 

आवारगी में ही कट गई मौसमें-बहार 
पतझड़ों में दामन अपना कैसे बचाऊँ। 

साजिशें सभी मेरे अपनों की ही तो थीं 
इल्ज़ाम दुश्मनों पर भला कैसे लगाऊँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल