Monday, September 19, 2022

{३५३ } जीवन का यही ताना-बाना




फ़ूल खिलते हैं 
सूख जाते हैं 
झर जाते हैं,

काँटे भी मिलते हैं 
चुभते हैं 
बिखर जाते हैं,

सुख आता है 
सुख जाता है 
रुकता नहीं है,

दुख भी आता है 
दुख जाता है 
पर रहता नहीं है,

जीवन का यही नियम है 
जो आज यहाँ है 
वो कल जाने कहाँ हो,

मिलना और बिछड़ जाना 
फिर से मिलना 
और फिर से बिछड़ जाना,

जीवन का यही ताना-बाना।
जीवन का बस यही ताना-बाना।। 

.. गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Saturday, September 17, 2022

{३५२ } मेरी अम्मा .. प्यारी अम्मा




जीवन को नाम देती
होंठों को मुस्कान देती
स्वप्नों को परवान देती
हौसलों को उड़ान देती
मेरे दर्द मे कराह देती
माथे पर छलछला आए पसीने को
अपने नरम आँचल से पोंछ देती
फिर बहुत दुलार से
सिर पर हाथ फेर देती
अपनी ममता भरी छाँव में लेकर
दुनिया के हर दुख से दूर कर देती,

ढूँढता हूँ आज उस आँचल को
जिससे बिछड़ चुका हूँ वर्षों पूर्व
उस आँचल का नर्म अहसास
आज भी मुझे दुलरा जाता है
और लगता है कि जैसे तुम यहीं कहीं हो
मेरे ही आस-पास .. .. .. 

मेरी अम्मा .. प्यारी अम्मा.. .. .. !!!

.. गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Friday, September 16, 2022

{३५१ } अनुज ! तुम कहाँ चले गए




अनुज ! तुम कहाँ चले गए 


अब सिर्फ तुम्हारी यादें ही शेष 
होठ फड़फड़ाते पर मौन हैं शब्द 
शून्य में तुम्हें खोजती आँखें 
पर तुम दूर बहुत दूर हो..........

उफ्फ़ 

हृदय में तीव्र पीड़ा 
कोई उपचार भी तो नहीं 
इस हृदयविदारक पीड़ा का 

बस 
आँसुओं से ही कर रहा तर्पण 
शायद इसी से 
मुझे कुछ शान्ति मिले। 
मुझे कुछ शान्ति मिले ।। 


.. गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, September 15, 2022

{३५०} हाँ, वो किसान है




हाँ, वो किसान है। 
चीर कर धरती का सीना 
वो बहाता नित पसीना 
वो ही गेंहू बाजरा और धान है। 
हाँ, वो किसान है।। 

खेतों को उसने जतन से है पाला 
उससे ही है तेरा और मेरा निवाला 
वो ही इस देश की पहचान है। 
हाँ, वो किसान है।। 

धूप और बारिश मे पला है 
अपनों ने ही रोज उसे छला है 
कदम-कदम पर वो परेशान है। 
हाँ, वो किसान है।।

बादलों से आस टूटी 
जैसे उसकी साँस छूटी 
सूखती फसलों का वो श्मशान है। 
हाँ, वो किसान है।।

ज़िंदगी बहुत पड़ी है 
मुश्किलें बड़ी-बड़ी हैं 
टूटते उसके अरमान हैं। 
हाँ, वो किसान है।।

.. गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, September 14, 2022

{३४९ } अब न छूटेगा ये रास्ता मोहब्बत का




अंजाम हुआ क्या, बर्बाद मोहब्बत का 
क्यूँ कत्ल हुआ यारों, पाक मोहब्बत का। 

हम जाते हैं महफ़िल से टूटा दिल लेकर 
इंसाफ खुदा देगा, अब मेरी मोहब्बत का। 

वो नेह के बंधन थे, तुम तोड़ गए जिनको 
कमजोर बड़ा निकला, धागा मोहब्बत का। 

रोते हैं चमकते सितारे और रोती रातें भी 
देखो चाँद भी रोता है, अपनी मोहब्बत का। 

चाहे तुम मुझे यूँ ही बेअदब ही कहते रहो 
अब न छूटेगा मेरा ये रास्ता मोहब्बत का। 

............ गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३४८} तमाम उम्र का हिसाब निकाल के रख



तमाम उम्र का हिसाब निकाल के रख
बची जरा सी उम्र उसे सम्हाल के रख ।

हर कदम यहाँ फिसलन ही फिसलन है
बाकी सफर है कदम देख-भाल के रख। 

हसीन ख्वाब आते हैं पर सच नहीं होते 
इन्हे कुछ दिन के लिए तू टाल  के रख। 

हयात जैसी भी गुजरी है गुजरी बेहतर 
जो बाकी है उम्र बिना सवाल के रख। 

चिराग जैसे है वैसी ही है रौशनी उनकी 
चुनांचे जेहन में खयाल कमाल के रख। 

..  .. गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३४७ } खो गया हूँ शहर की रफ्तार में




मैं खो गया हूँ शहर की रफ्तार में 
दिल टहल रहा इश्क के गुलजार में|

अब तो नुक्कड़ भी नही पहचानता 
बैठा करता जहाँ मैं यूँ  ही बेकार मे |

उस गली मे फिर कहाँ जाना हुआ 
दिल जहाँ टूटा था पहले प्यार में|

मुस्कुराहट उलझनों मे बदल गई 
उलटफेर ये ज़िंदगी के गुलजार में |

लौट चलें फिर उस बचपन की ओर 
कुछ नहीं रखा जवानी के प्यार में|

.. .. गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, February 25, 2018

{३४६} ज़िन्दगी किस्सा कहानी हो गई





प्यार की बातें  जहमत  और फ़ानी हों गईं
अब तो ये ज़िन्दगी किस्सा कहानी हो गई।

पुरानी हो गईं वो  इश्क-मोहब्बत की बातें
बिसरी यादों में  आँखें पानी-पानी हो गईं।

मोहब्बत में बहुत  सहा बेरुखी के दर्द को
दर्द मॆं ही बर्बाद हमारी ये जवानी हो गई।

अपनों का अपनों से भरोसा ही उठ गया
फ़रेब ज़िन्दगी की सच्ची कहानी हो गई।

आखिरी फ़रमान  रब  का  कब आ जाए
अब जहाँ की  बातें  आनी-जानी हो गईं।

.................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल "राही"

Sunday, October 1, 2017

{३४५} शहीद हूँ मैं




शहीद हूँ मै............ !!!

मेरे देश वासियों,
मेरे लिये सिर्फ़ इतना कर देना
कि,
जब कभी आप खुलकर हँसें,
जब आप शाम को अपने घर लौटॆं
और अपनों से मिलें,
जब आप अपने बच्चों के सँग खेलें,
जब आप सुकून से सोयें,
मुझे भी कभी याद कर लेना........
मेरे देश वासियों,
मेरे लिये सिर्फ़ इतना कर देना......।।

आप और आपका परिवार
आज जिन्दा है,
क्योंकि,
नहीं हूँ.... आज मैँ......!!!

अपनी भारत माँ के लिये,
आपकी शान्ति और सुख के लिये,
भारत की अखन्डता के लिये,
भारत की सीमाओं पर
अपने प्राण निछावर कर दिये हैं मैंने...........

शहीद कहलाता हूँ मैं,
शहीद हूँ मैं।
शहीद हूँ मैं।।

.................. गोपाल कृष्ण शुक्ल "राही"

{३४४} हम तुम




हम तुम
हाँ तुम,

अब तुम
तब तुम,

मैं कब
जब तुम,

मैं क्या
सब तुम,

पाया क्या
तुम ही तुम,

ख्वाहिश क्या
केवल तुम,

सोंचूँ क्या
सिर्फ़ तुम,

क्या मेरे
रब तुम,

हाँ मेरे
रब तुम।।

...... गोपाल कृष्ण शुक्ल "राही"