Saturday, April 11, 2015

{ ३०५ } हम अपने साये से भी डरने लगे





हम अब अपने साये से भी डरने लगे
जब उनके भी चढ़े मुखौटे उतरने लगे।

पलकों को बन्द कर बैठता हूँ जब भी
साजिशों के घने अन्धेरे उभरने लगे।

फ़ूल गुलशन में हमारे हजारों थे मगर
मेरे चमन में खार ही खार सँवरने लगे।

जब कभी भी परवाज़ को उठाई है नज़र
फ़ैले हुए पँख वो हमारे ही कतरने लगे।

थम गई खिलखिलाहट टूट गई खुशियाँ
बे-दिली - बे-कसी मे दिन गुजरने लगे।

....................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

बे-दिली = उदासी
बे-कसी = दुःख

Sunday, March 29, 2015

{ ३०४ } रात ढ़ली जाती है






चढ़ी हुई रात यूँ ही ढ़ली चली जाती है
साथ ज़िगर को भी चीरे चली जाती है।

कल तलक थी जो साथ में ही मेरे, आज
हर सूँ देखा कहीं वो नज़र नहीं आती है।

मेरा टूटा हुआ दिल बिखरा पड़ा हरतरफ़
न जाने कैसे - कैसे वोह सितम ढ़ाती है।

कुछ पल को तो करीब आ जा ओ जालिम
दिल की प्यास हर सूँ चीखती चिल्लाती है।

अब मुझसे कतई रहा जाता नहीं तेरे बिना
ये ज़िन्दगी दर्द की ही जागीर हुई जाती है।


.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Tuesday, March 24, 2015

{ ३०३ } सन्नाटा





चारो तरफ़ घुप्प अँधेरा
वातावरण में गूँज रहे हैं
चीटियों से फ़ुसफ़ुसाते शब्द
अचानक एक किरण सी चमकती
पर ऐसा क्यों लगता है कि
अभी सब किसी गहरी खोह में
अदृश्य हो जायेगा,
सिर्फ़ बचा रह जायेगा
पीड़ादायी, रेंगता हुआ सन्नाटा।।

............................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Saturday, March 7, 2015

{ ३०२ } हमें तुमसे बहुत प्यार है





ओ नाजनीन हमें तुमसे बहुत प्यार है
पर जमाना बना हुआ बीच मे दीवार है।

ये हमारे प्यार की ही मजबूत नींव है
होती रहती जो कभी-कभी तकरार है।

तड़पना, जगना और राह का तकना
यही मोहब्बत का असली किरदार है।

हमे तन्हा प्यार के सफ़र में न छोड़ना
आसां नही इश्क की राह बहुत दुश्वार है।

चले जायेंगे एक दिन दुनिया छोड़कर
पर कहते रहेंगे कि हमे तुमसे प्यार है।

........................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Monday, February 23, 2015

{ ३०१ } चन्द्रमा की आग





अब सहन नहीं होती सूरज की तपन
और यह चन्द्रमा भी तो आग उगलने लगा है
शायद..........
दोनो में कोई गुप्त समझौता हो गया है।

कहाँ जायें इस तपन से बचने के लिये
कलकल करती हुई किसी नदी में,
झरझर झरती हुई किसी झील में
या किसी गगनचुम्बी पर्वत पर।

पर क्या हम वहाँ इसकी तपन से,
इसकी झुलसा देने वाली आग से
स्वयं को बचा पायेंगें?

हमारे सारे अरमान तो
इसकी आग में जल गये, राख हो गये,
अब इस राख का क्या मोल रह गया,?
किस काम आयेगी यह राख.......?

पर मैं सुरक्षित रखूँगा इस गर्म राख को
इस गर्म राख के अन्दर सुलगने वाली आग को।

शायद वो ही
इस सामाजिक और प्राकृतिक विद्रूपता से बचा सके
शायद वो ही
इस सामाजिक और प्राकृतिक विद्रूपता को समाप्त कर सके।

शायद यह सुलगती हुई आग ही
सूरज की प्राकृतिक तपन
और चन्द्रमा की शीतलता को
वापस ला पायेगी।

हाँ ! अवश्य ला पायेगी।
हाँ !! अवश्य ला पायेगी।।

................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


Saturday, January 31, 2015

{ ३०० } प्रलय की भूमिका






निर्माण जिसे तू कहता फ़िरता
मूरख ! वह भूमिका तो प्रलय की है.............
अपनी सुविधा में लगे हुए चिल्लाते हो
कहते ये माँग आज के समय की है.............
वंचक हो जायें शासक तो समझ लो
उन्नति हुई चहुँओर सिर्फ़ अनय की है..........
कथनी में त्याग-स्नेह है लेकिन
करनी में छाप लगी संचय की है.................
हो जाओ खबरदार घिरने को उठी
चहुँओर घनघोर घटा क्षय की है..............
निर्माण जिसे तू कहता फ़िरता
मूरख ! वह भूमिका तो प्रलय की है।।


........................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, January 21, 2015

{ २९९ } दुख दर्द ही बचे मेरे मुकद्दर में





ये दुख दर्द ही बचे मेरे मुकद्दर में हैं
हो गया गम का बसेरा मेरे घर में है।

खुशियाँ भी पास आती तकल्लुफ़ से
मेरा मस्कन जो गहरे समन्दर में है।

किया भरोसा मैंने उस शख्स पर भी
जो रहता मेरे दुश्मन के लश्कर में है।

मैं वो पत्थर नहीं जो देवता बन सकूँ
मेरा ठिकाना हर पैर की ठोकर में है।

जिये जा रहा जीने की तमन्ना ले कर
शायद कुछ जान बाकी इस पिंजर में है।

...................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



मस्कन = रहने का स्थान

Saturday, January 10, 2015

{ २९८ } पर, प्रियतम तुम कभी न आये





पर, प्रियतम तुम कभी न आये।

स्मृति पट पर अब तक मैंनें
जाने कितने ही चित्र बनाये,
कितनी बार नयन के घन से
पीड़ा के अँकुर सरसाये।
पर, प्रियतम तुम कभी न आये।।१।।

मेरे उर की विकल वेदना
प्रियतम तुम समझ न पाये,
मेरे मौन रुदन की भाषा
सुन कर भी जान न पाये।
पर, प्रियतम तुम कभी न आये।।२।।

कितनी बार पपीहे के स्वर में
मैंनें विरह के गीत दोहराये,
कोई दिन गया न ऐसा जब
हमने आशा-दीप नहीं जलाये।
पर, प्रियतम तुम कभी न आये।।३।।

.................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Monday, January 5, 2015

{ २९७ } बूढ़ा मन काँपने सा लगता है





कँगूरों पर जब शाम उतर आती है
ये बूढ़ा मन काँपने सा लगता है.........।

खुशियों के चमन के फ़ूलों की पाँखे
काँटों से सजी सेज हो जाती है.........
पोर-पोर तक थक कर चूर हुए दिन की
उखड़ती हुई साँसे तेज हो जाती हैं........
अम्बर को भेदते शिखरों का मस्त राही
रपटीली ढ़ालों पर हाँफ़ने सा लगता है.......।

कँगूरों पर जब शाम उतर आती है
ये बूढ़ा मन काँपने सा लगता है...........।।

................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

Sunday, January 4, 2015

{ २९६ } मोहब्बत की गहराइयाँ





मोहब्बत में छिपी गहराइयाँ देखो
झूठ मे दफ़न हुई सच्चाइयाँ देखो।

दिल की दहकती आग दबती नहीं
नकाब में छिपी रुसवाइयाँ देखो।

खामोश रात, बोझिल चाँदनी में
मेरे आँगन की तनहाइयाँ देखों।

मेरे गमों का तुमको गुमान नहीं
आहों से बजती शहनाइयाँ देखो।

 है मेरी मोहब्बत का ये निशान
अपने पीछे मेरी परछाइयाँ देखो।

............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल