Monday, March 18, 2013

{ २५४ } रूठ गईं चाँदनी रातें






जाने क्यों रूठ गयीं हमसे वो चाँदनी रातें
भूली-बिसरी यादें उनसे हुई वो मुलाकातें।

तुम्हे भी याद होंगे बहारों के सुनहरे पल
मुकद्दर की सौगातें मोहब्बत वाली रातें।

बिन बरसे गुजरे अब्रे-बाराँ ऐसा मैं सहरा
किस प्यासे पे हुई मोहब्बत की बरसातें।

नजर आती अपने यार की सूरत जो कहीं
दिल कहता ऐ खुदा हैं तेरी ही ये इनायाते।

फ़िर रहा दर-ब-दर जँजीरे-रुसवाई लिये
बन चुकी हैं तमाशा ज़िन्दगी की सौगाते।


........................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल

अब्रे-बाराँ = पानी वाले बादल
सहरा = जँगल
जँजीरे-रुसवाई = बदनामी से जकडा हुआ


Sunday, March 17, 2013

{ २५३ } मन करता है






मन करता है मदमाते मौसम में फ़िर से
रागमयी गीतों के मादक स्वर हो जायें।।

वो ठहरी-ठहरी घडियाँ
वो महकी-महकी रातें
वो गहरी-गहरी साँसें
वो बहकी-बहकी बातें

भटकी चाहों की मृदु कलिका फ़िर से
उन्मादी घटा सी बौरायें, मुखर हो जायें।
मन करता है मदमाते मौसम में फ़िर से
रागमयी गीतों के मादक स्वर हो जायें।।१।।

मधुपल जिसमें हों लसित
रातों की मीठी मनुहारें
मन-आँगन के नन्दनवन में
मचलें तप्त तृषित बहारें

प्रबल प्रभंजन बन कर आयें श्वासें फ़िर से
प्रमुदित मन उत्तुँग लहर हो जाये।
मन करता है मदमाते मौसम में फ़िर से
रागमयी गीतों के मादक स्वर हो जायें।।२।।

वो दिन कितने प्यारे होंगें
वो शामें कितनी कोमल होंगी
वो सुखदायी मादक रातें
उन्मादी प्रणय-पल होंगीं

रँग-बिरँगी स्वर्णिम स्वप्न निशा में फ़िर से
समर्पित तन-मन से जीवन सुखकर हो जाये।
मन करता है मदमाते मौसम में फ़िर से
रागमयी गीतों के मादक स्वर हो जायें।।३।।


-------------------------------------------- गोपाल कृष्ण शुक्ल


Friday, March 8, 2013

{ २५२ } मुस्कान वीरानी है






मेरे हर ज़ख्म की खौफ़नाक कहानी है
मायूस चेहरे पे छाई मुस्कान वीरानी है।

गमों की चटक धूप झुलसा गयी है हमें
भावनायें हो चुकी मौन की निशानी है।

ज़िंदगी भर वक्त ने लम्हा-लम्हा लूटा
दर्दो-गम औ’ मुश्किलें हुईं दर्मियानी हैं।

आए न जिनको रहबरी का सलीका ही
हुआ काफ़िला उनकी सुपुर्दे-निगरानी है।

गुलों की जुस्तज़ू में हुई खारों से दोस्ती
बाद मुद्दत के सीरत उनकी पहचानी है।

अरमानों के शीशमहल मे छाई खामोशी
तनहाई का मौसम, शामे-गम सुहानी है।

आस की नींदों के ख्वाब सहर मे जुदा हुए
ऐ ज़िन्दगी ! कैसी बेरहम तेरी कहानी है।


--------------------------------- गोपाल कृष्ण शुक्ल


रहबर = पथप्रदर्शक
सीरत = स्वभाव


Tuesday, March 5, 2013

{ २५१ } आ बसा कोई






निगाहों में आज आ बसा कोई
आँखों से पिला गया नशा कोई।

लगता कोई चाँदनी है साथ में
न होगा जमाने में हमसा कोई।

फ़िज़ा में गूँजे शहनाई की धुन
सूने दिल मे हुआ जलसा कोई।

रूह में भर गई जीने की आरजू
लगे इश्क का बादल बरसा कोई।

तेरे ही आगोश मे कटे ज़िन्दगी
और न कोई आरजू न नशा कोई।


....................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ २५० } कत्ल हुआ दिल






टकरात क्यों आइना पत्थर से बार-बार
डूबता है दिल दर्दे-समन्दर में बार-बार।

समझ ही न सका कि मेरा कुसूर क्या है
सुनता रहा सजा सितमगर से बार-बार।

अपने प्यार की शिकायत करूँ किस से
लुटा हूँ बीच राह गारतगर से बार-बार।

जिनके लिये जला किये शमा की तरह
कत्ल हुआ मैं उसी चारागर से बार-बार।

दरिया सा मस्त बहना था अपना अंदाज़
लड रही तकदीर अब मुकद्दर से बार-बार।


.................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


गारतगर = लुटेरा
चारागर = हकीम


Sunday, March 3, 2013

{ २४९ } याद तुम्हारी सता रही है






मृदुल-चँन्द्र किरण वातायन से
झाँक-झाँककर मुस्कुरा रही है।
आओ सजनि, याद तुम्हारी सता रही है।।

सुधियों के सागर में आनन
प्रतिबिम्बित होते पल-पल
लहराते बिखरे केश-कुन्तल
जैसे छाए हों सँध्या के बादल।

श्यामल-अँगों की मधुर गँध
प्राणों को लुभा रही है।
आओ सजनि, याद तुम्हारी सता रही है।।१।।

चपल चाँदनी जब झाँकती
झुरमुटों में से लजा कर
मौलश्री से सुवासित
वायु चलती मुस्कुरा कर।

मस्त-मस्त मँथर पवन
तन-मन गुदगुदा रही है।
आओ सजनि, याद तुम्हारी सता रही है।।२।।

और न अब प्यासे को भटकाओ
मन की आशाओं को न ठुकराओ
रूप-वारुणी के चषक पिलाओ
मन-मोहक रागिनी सुनाओ।

नूपुरों की मधुर ध्वनि
कँठ को लुभा रही है।
आओ सजनि, याद तुम्हारी सता रही है।।३।।


....................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Saturday, March 2, 2013

{ २४८ } प्रियतम बोलो तो, बोलो तो






मेरे प्राण ! तुम हो, कुन्दन-कुन्दन।
प्रियतम बोलो तो, बोलो तो।।

स्मृति-पट पर अब तक
मैंने, अनगिन चित्र उकेरे,
कितने ही आमंत्रण भेजे
मैंने, नित्य साँझ-सबेरे।

तुम हृद में, फ़िर भी मैं उनमन-उनमन,
मेरे प्राण ! तुम हो, कुन्दन-कुन्दन।
प्रियतम बोलो तो, बोलो तो।।१।।

तुम पूर्णिमा-सम मस्त यौवन
दग्ध-हृदय की मैं कथा हूँ
लिये मिलन की आस हृदय में
उत्ताल सागर मैं मथ रहा हूँ।

अर्पण हो जाने को, विचलन-विचलन,
मेरे प्राण ! तुम हो, कुन्दन-कुन्दन।
प्रियतम बोलो तो, बोलो तो।।२।।

नीले अम्बर की छाया में
खिली चाँदनी सा मुस्काना
अभिसार याचित रजनी में
छुई-मुई सा शरमा जाना।

साँसों के क्रम में दहकन-दहकन,
मेरे प्राण ! तुम हो, कुन्दन-कुन्दन
प्रियतम बोलो तो, बोलो तो।।३।।

घूँधट-पट खोलो, मैं भी देखूँ
अवगुँठन के पीछे कैसी माया,
यों तो तुमने पहले ही कर दी
अपनी चितवन से तरंगित काया।

तृषित मन विचरत, मधुवन-मधुवन,
मेरे प्राण ! तुम हो कुन्दन-कुन्दन।
प्रियतम बोलो तो, बोलो तो।।४।।

मेरे उर की विकल वेदना
प्रियतम तुम कब पहचानोगे,
मेरे मौन रुदन की भाषा
कब सुनोगे, कब जानोगे।

मेरी साँसों पर है आहों का बन्धन,
मेरे प्राण ! तुम हो कुन्दन-कुन्दन।
प्रियतम बोलो तो, बोलो तो।।५।।


.............................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Sunday, February 24, 2013

{ २४७ } कैसे कह दूँ ये प्यास नही है





कैसे कह दूँ ये प्यास नही है।

आस जब-तब लुभा रही है
प्यास और जगा रही है
मन हुआ तपता धरातल
दूर कहीं दिखता है जल
कैसे कह दूँ ये हुलास नही है।
कैसे कह दूँ ये प्यास नही है।।

मोहित है मन तरंगित काया
जाने किसका नेह समाया
वश नही मन पाँखों पर
बैठे नैन चिरैय्या किन शाखों पर
कैसे कह दूँ ये मन का मधुमास नही है।
कैसे कह दूँ ये प्यास नही है।।

वो कौन मुझको दूर से पुकारे
नेह दृष्टि से मुझको निहारे
अनुभूतियाँ नित हो रही सघन
देह की बढ रही तपन
कैसे कह दूँ ये आस नही है।
कैसे कह दूँ ये प्यास नही है।।


................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Saturday, February 23, 2013

{ २४६ } हम और तुम





एक दूसरे का
हाथ थामे
नदी के तट तक
आ गये है
हम और तुम।

पागल सर्द हवा में
उसी तरह
लहरा रहा है
तुम्हारा आँचल
जैसे
नदी बहती है
कल-कल, कल-कल।

नदी में
जल का
सतत प्रवाह
वैसा ही है
जैसे
हमारा प्रेम अथाह।

मँत्रमुग्ध सा
मैं अपलक देख रहा हूँ
क्षितिज में
जहाँ पर आपस में
मिल रहे हैं
दो प्रेमी बादल
वो भी थामें हैं
एक दूसरे का हाथ
बिलकुल उसी प्रकार
जैसे
इस वक्त
नदी के तट पर
खडे हैं
हम और तुम।।


...................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, February 20, 2013

{ २४५ } कहाँ अपना ठिकाना है






थकन तो अगले सफ़र के लिये एक बहाना है
जिस्म बदलती रूह का कहाँ एक ठिकाना है।

पिये दर्द के प्याले मन ढकने को आँसू हैं कम
लाखों की भीड यहाँ, पर कोई नही पहचाना है।

दर्द ही पाया दर्द सँजोया दर्द ही जीता आया हूँ
दर्द ही है तकदीर हमारी, दर्द मे ही मुस्काना है।

जिस-जिस चेहरे में जब भी अपनापन है ढूँढा
उनसे पाया मैने हरदम दर्द का ही नजराना है।

खूब रोया खून के आँसू खुद को तनहा देख कर
हो अचम्भित खोजता, कहाँ अपना ठिकाना है।


......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल