Thursday, May 17, 2012

{ १६६ } पीते रहो ! पीते रहो !!





पीते रहो ! पीते रहो !! ऐ रिन्द पीते रहो !!!
अभी न रखो जाम
जितना पिलाये साकी, पीते रहो।
पीते रहो ! पीते रहो !! ऐ रिन्द पीते रहो !!!

मये-जाम से मन की लहरें गगनचुम्बी हो रही है
अँधेरी, सूनसान राहें रोशनी से जगमग हो रही हैं
ऐ रिन्द ! मत झुकना बाधायें स्वयं झुक जायेंगी
सुधा-मय पेय बाकी, साँझ से भोर तक पीते रहो।
पीते रहो ! पीते रहो !! ऐ रिन्द पीते रहो !!!

मत खोजो किसी का साथ सब मिथ्या है
अन्त तक साथ नहीं रहे कोई तो क्या है
दर्द दूसरों का कहीं कभी कोई आँकता है
मैखाने के मीत देखो, साकी से मौन न रहो।
पीते रहो ! पीते रहो !! ऐ रिन्द पीते रहो !!!

पीते रहो ! पीते रहो !! ऐ रिन्द पीते रहो !!!
अभी न रखो जाम
जितना पिलाये साकी, पीते रहो।
पीते रहो ! पीते रहो !! ऐ रिन्द पीते रहो !!!


.................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

Wednesday, May 16, 2012

{ १६५ } हूरे-जन्नत





खुदा का नूर हो, दिखती जन्नत की हूर हो
दिल की सदा है ये तुम्ही चश्म-ए-बद्दूर हो।

ख्वाबों में हर दिन ये ही सिला खोजते रहे
कैसे करीब आऊँ कि इन्तजार तो दूर हो।

देखूँ, आह भरूँ दम भी निकलेगा एक दिन
तमन्ना नजदीकी की पाले, पर तुम दूर हो।

डूब जाना दरिया में आँखों की रंगत देखकर
सूरत खुदा का नूर औ’ सादगी से भरपूर हो।

फ़ीकी हर मिसाल, तुम जहाँ में हो बेमिसाल
अब हो रहा एहसास, कि तुम मेरे गुरूर हो।


.............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

Tuesday, May 15, 2012

{ १६४ } क्षितिज





दूर, बहुत दूर पर कहीं
हमने अक्सर देखा।

अम्बर के
नीलाभ पटल पर
मटमैली धरती
अपना रंग घोलती।

ये दृष्य देख कर
मेरा मन हुलस उठा
मष्तिष्क में
प्रश्न कौंधा
कैसे पावन-बन्धन में
बाँध रही है
धरती और अम्बर को
यह क्षितिज रेखा।

दूर, बहुत दूर पर कहीं
हमने अक्सर देखा।।


..................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Monday, May 14, 2012

{ १६३ } दिल के बन्द दरवाजे





संकेतों की भाषा जब-कब बोलोगे
बन्द दरवाजे दिल के कब खोलोगे।

सपनों की अट्टालिका है सजी हुई
सुधि के दरवाजों को कब खोलोगे।

पुष्प की पाँखुरी बन वातावरण में
सुगन्ध की मधुर बयार कब घोलोगे।

बाकी हैं अब भी ज़िन्दगी की उमंगें
किसी को सनम अपना कब बोलोगे।

कौन सी ऐसी खता हो गई है हमसे
शबो-रोज सोचूँ, मुँह तुम कब खोलोगे।

प्यार वफ़ा का मतलब तब जानोगे
अपने ही दिल को जब तुम तोलोगे।


..................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Sunday, May 13, 2012

{ १६२ } बुझा हुआ स्वर





पला अभावों के घर, ठोकर खा - खाकर, पीडा पीकर
मौत रोज बताती आकर, क्या करना तुमको जी कर।

जाने कितने जहरीले दिन काट दिये हैं हँसते-हँसते
मर गया समय का सर्प, जहर मेरे जीवन का पीकर।

अपने संघर्षों के प्रश्नों का मैं अनुत्तरित उत्तर ही हूँ
ढहे मंसूबे बडॆ - बडॆ और रेत के महल इस जमीं पर।

वर्तमान के कोलाहल का मैं एक बुझा हुआ स्वर हूँ
भूला रिश्तों को, जी रहा जहरीली हवाओं को पीकर।

अब अभिनय का दौर, सज गये मँच गलियों-गलियों
चका चौंध और कोलाहल में रागमयी स्वर दबा भीतर।


....................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ १६१ } एहतराम किया है मैंने





गम और खुशी सबका एहतराम किया है मैने
ऐ ज़िन्दगी तुझको खूबसूरती से जिया है मैने।

कोई मानता नही मेरी इस दीवानगी को ऐ खुदा
पत्थर को भी तो खुदा का ही दर्जा दिया है मैने।

तेरे हर एक खुश-मंसूबों को सहेज कर रखा है
अमानत सा पाला पोसा फ़र्ज अदा किया है मैने।

ज़िन्दादिली की हसरत तूने इस कदर बढा दी
खुद अपनी मैय्यत को काँधा दे दिया है मैने।

तेरे इस जहाँ में जगह-जगह फ़ैले हैं कदरदान
मिले जहाँ-जहाँ, उनको सलाम किया है मैने।

उल्फ़त नही सँभलती, नफ़रत कहाँ थी बस में
इकराम-ए-ज़िन्दगी को खुशी से जिया है मैने।

हर शह को रब पर छोडा और भूले सारी रस्में
बन्दे हैं खुदा के, खुदा को सलाम किया है मैनें।


...................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


एहतराम = सम्मान
खुश-मंसूबों = नेक इरादे
इकराम-ए-ज़िन्दगी = भगवान की दी हुई ज़िन्दगी



Friday, May 11, 2012

{ १६० } स्व-बोध




हृदय की रिक्तता का
अगर बोध हो करना
देखना स्वयं को
और मनन करना।।

हृदय की महानता का
अगर बोध हो करना
देखना किसी महान को
और सम्मान करना।।

रिक्तता और महानता का
अगर अन्तर हो नापना
अपने और उनके अन्तर को
हृदय से अनुमान करना।।


................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ १५९ } बीमार है ये ज़िन्दगी




हर घडी बेबस, उदास, खलीउल-इजार है ये ज़िन्दगी
बस जी रहे हैं मजबूरियों में हम, बेजार है ये ज़िन्दगी।

सरताज है कौन अपना, हम ढूँढते फ़िर रहे हैं सब तरफ़
इस आस में ही गुजरता वक्त, इन्तजार है ये ज़िन्दगी।

जब सारा जहाँ खुशहाल है, फ़िर कहर हम पर ही क्यों
खयाल ये जेहन में है कैसे कटेगी, फ़िगार है ये ज़िन्दगी।

मची है हलचल सी दिलो-दिमाग में, हर घडी इम्तिहान,
कमबख्त जियें क्यों इसे, फ़ित्ना-परदाज है ज़िन्दगी।

अपनी तकदीर का रोना लिये अब जायें किसके पास हम
राहत कहाँ, आह कर सकते नहीं, बीमार है ये ज़िन्दगी।


.................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल



खलीउल-इजार = बेलगाम
फ़िगार = जख्मी
फ़ित्ना-परदाज = साजिशी


Wednesday, May 9, 2012

{ १५८ } वृक्ष, एक वृक्ष




वृक्ष, एक वृक्ष,
हरा-भरा
कली-फ़ूलों से लदा
जीवन की अन्तिम साँस तक
सिर्फ़ सुगन्ध लुटाता है।।

वृक्ष, एक वृक्ष,
जिसकी स्निग्ध छाया
हर इसांन को
हृदय से लगाती है
और सिजदा करती है।।

वृक्ष, एक वृक्ष,
धरती पर फ़ूल लुटाता
हर इसांन को
आँसू पी कर
मुस्कुराना सिखाता है।।


............................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


Tuesday, May 8, 2012

{ १५७ } ओ युवाओं..





ओ युवाओं ! भारत के शौर्य, ओ यशस्वी
विश्व में कीर्ति तुम्हारी, बुद्धिमान तपस्वी
ललकार रही आज तुम्हे सियारों की श्रेणी
आई है दूषित करने माँ भारती की वेणी।।१।।

ये नही उषाकाल, है पश्चिम की दिशा लाल
आँधी काली-काली उठती, अब उसे सँभाल
होता आश्चर्य बहुत, तिमिर कैसे नियराया
घर का शेर मरने के क्षण, है लगता बौराया।।२।।

विश्व विजेता संतति हो, कौन टक्कर लेगा
खोलो नेत्र तीसरा, कालकूट धू-धू जल उठेगा
उठो शार्दूल ! अब अरिदल को धूल चटा दो
देश-द्रोहियों को दे सजा, नर्क तक पहुँचा दो।।३।।


.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल