Tuesday, May 8, 2012

{ १५६ } भ्रष्टाचार की फ़सल





सुरसा मुख धारी भ्रष्टाचारी आचरण,
शहर के गन्दे-गलीच नालों के अपने लिये
सुगम पथ को अपनाकर तेज गति से
निच्छल और उन्मुक्त बहने वाली
नदियों में गिरकर, घुल-मिल कर
अब गाँव-देहात के खेत खलिहानों को
सिंचित करने में जुटे हुए है,

भय है कि,
कृषि प्रधान देश भारत का
सरल और मेहनतकश किसान भी कहीं
सुरसा मुख धारी भ्रष्टाचार रूपी फ़सल को
संरक्षित न करने लगे।।


....................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Monday, May 7, 2012

{ १५५ } चेहरा





भीड में खो जाता इंसान का चेहरा

हर तरफ़ घूमता बेईमान का चेहरा

कहीं है हैवान कहीं शैतान का चेहरा

कोई लगा बैठा अभिमान का चेहरा

नही मिलता अब नूरान सा चेहरा

बदलते रंग तिलिस्मान सा चेहरा

आइना बयाँ करे इंसान का चेहरा।।


................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Sunday, May 6, 2012

{ १५४ } आइना तरसता है हमारा





हुस्न के अक्स को आइना तरसता है हमारा
दिन ढलते ही दिल डूबने सा लगता है हमारा।

कब समाँ देखेंगे, दिले-जख्म के भर जाने का
बुरा वक्त गुजरने को नही मचलता है हमारा।

आधी-अधूरी ख्वाहिशों का सिलसिला रह गया
मंजिलों से हर वक्त फ़ासला रहता है हमारा।

मैं ही सबब था शायद अपनी इस शिकस्त का
एहसासे-मसर्रत दर पे नहीं रुकता है हमारा।

हमसे उन बीती हुई शामों का चर्चा न कीजिये
एहसास नही है आपको, दिल डूबता है हमारा।


........................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल



एहसासे मसर्रत = खुशी


Saturday, May 5, 2012

{ १५३ } पैसा बोले........




हम क्या बोलें ?
पैसा बोले......
पैसा बोले......

बेबस इसाँ की शुचिता को
भीगी आँखों की सरिता को
सारा जग पैसे से तोले ।

हम क्या बोलें ?
पैसा बोले......
पैसा बोले......

इसके पीछे है दुनिया पागल
साधू-संतों का मन भी घायल
पैसे पर ही सारी दुनिया डोले ।

हम क्या बोलें ?
पैसा बोले......
पैसा बोले......

सुख-सुविधा का ढेर लगा दे
भेद हृदय के सारे खुलवा दे
पैसा बदल दे सबके चोले ।

हम क्या बोलें ?
पैसा बोले......
पैसा बोले......

उसको सुख का आनन्द नही
उसके पुष्पॊं पर मकरन्द नही
बिन पैसे काँटों पर सो ले ।

हम क्या बोलें ?
पैसा बोले......
पैसा बोले......

गुण से ज्यादा अवगुण धन में
कटुता ही कटुता भरता मन में
फ़िर भी मानुष पैसा-पैसा बोले ।

हम क्या बोलें ?
पैसा बोले......
पैसा बोले......


........................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल






Friday, May 4, 2012

{ १५२ } ज़िन्दगी, तुम्हे सँवारते रहे हम




हम जिये भी तुम्हारे लिये मरे भी तुम्हारे लिये
घुटन, दर्दे-दिल बचा है किस्मत में हमारे लिये।

हमने ही फ़ूल बोए थे, खारों को भी सहेजा हमने
अब पराया हो गया वो ही गुलिस्ताँ हमारे लिये।

किस्मत के आगे ये ज़िन्दगी भी हो गई मजबूर
माँगी दुआएँ, बदल न सके किस्मत तुम्हारे लिये।

ज़िन्दगी कभी शैतान, कभी बेमुरव्वत की तरह
ज़िन्दगी मे ढूँढते रहे मासूमियत तुम्हारे लिये।

बेकार सब सुख-सपन हुए, बरबाद साँसें हो गईं
ऐ ज़िन्दगी, तुम्हे सँवारते रहे हम तुम्हारे लिये।


............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Thursday, May 3, 2012

{ १५१ } इंसान का चेहरा




कहाँ खो जाता भीड में इंसान का चेहरा
हर उम्मीद और हर अरमान का चेहरा।

मुक्त बढने का अभी भी एहसास बाकी
क्यों दबाती हैं हवायें अरमान का चेहरा।

बढें भी तो कैसे बढें हम निर्भीक हो कर
यहाँ नोचती वासनायें इंसान का चेहरा।

दरवाजे भी बन्द कर बैठ गये अपने भी
झुकाता उनको सिर ये इंसान का चेहरा।

शबो-रोज ढलते हैं पैबन्दों को सीते-सीते
उमंग, रंगविहीन हुआ इंसान का चेहरा।


....................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ १५० } मोहब्बत के रंग




इस दिल को लोग एक जख्म रोज नया देते हैं
क्यों लोग मुझे मोहब्बत के लिये सजा देते हैं।

जुर्म है ? आशिक से मोहब्बत निबाह करना
मिले सजा, हम तो मोहब्बत की दुआ देते हैं।

कितने मस्ताने है मोहब्बते के ये सुहाने सपने
ज़िन्दगी में भरते रंग, नया लुत्फ़ सजा देते हैं।

आह ! ये बारिश का मौसम, ये हवा के झोंके
ये तो मोहब्बत के शोलों को और हवा देते हैं।

कभी बेरुखी, रुसवाई, तो कभी जुल्मो-सितम
ये मेरी मोहब्बत में एक नया रंग सजा देते हैं।

कितने ही रंगों से भरे पडे हैं इश्क के ये नग्मे
दिल में तरंग, मस्ती औ’ अरमान जगा देते हैं।


........................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, May 2, 2012

{ १४९ } तुमको देखा नहीं




जमाना गुजर गया, मुद्दतें बीतीं, तुमको देखा नहीं
तेरी याद बाकी है, अभी भी मैं तुमको भूला नही।

वो कयामत का ही दिन था, जब तुमसे हम बिछुडे
धडकने बढ गईं, दिल अब कहीं भी लगता नही।

सभी आइने मुझको देख के बडे परेशान-हैरान हैं
मैं सामने ही हूँ, पर मेरे चेहरे पर मेरा चेहरा नहीं।

मैं बीमारे-गम, अब हो गई मयखाने से दोस्ती मेरी
पैमाने साथी हैं, कदम डगमगा रहे, पर मैं बहका नहीं।

ये कैसा मौसमे-बहार, मौसमे-गुल चमन में आया है
मेरे जख्मी दिल का कोई जख्म अब तक महका नही।

ये किस मुकाम पर मुझको तनहा छोड कर चल दिये
सफ़र ज़िन्दगी का, कोई रास्ता मुझको दिखता नही।


................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Tuesday, May 1, 2012

{ १४८ } मौत जरूरी है





खुश-ज़िन्दगी की शुरुआत के लिये मौत जरूरी है
दर्दे-दिल, दर्देजाँ से निजात के लिये मौत जरूरी है।

ज़िन्दगी नाम है गुलशन में खिले सुर्ख गुलाबों का
साथी खारजारों से निजात के लिये मौत जरूरी है।

दर्द, कुंठा, घुटन, भरे इस कटघरे से बाहर निकल
आला हजरातों से मुलाकात के लिये मौत जरूरी है।

ऐ परवरदीगार ! तेरी इस कायनात की जीनतों में
पाने उस जन्नत की सौगात के लिये मौत जरूरी है।

हमारी यह साँस ही तो वजह-मर्ज और दर्दे-रूह है
जाना ये तबीब कि वफ़ात के लिये मौत जरूरी है।


.................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


तबीब = इलाज
वफ़ात = मौत

{ १४७ } भोर सिटपिटा रही है





सच्चाईयाँ गम उठा रही है
अब झूठ कदम बढा रही है।

ज़िन्दगी कहते हैं हम जिसे
वो मरने को छटपटा रही है।

अमरबेलें भी मुरझाने लगीं
उफ़ आ भीषण छटा रही है।

रात को सपने संजोये नींद
पर भोर सिटपिटा रही है।

मंजिलें और दूर खिसकती
अब रहगुजर मिटा रही है।

भूख से तबाह हुई बेचैनियाँ
तिनका-तिनका जुटा रही है।


.................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल