Wednesday, March 14, 2012

{ ११५ } खुद ही न टूट जाऊँ मैं





इन सूखे पत्तों को, पतझड में कहाँ तक बचाऊँ मैं
डर है तेज हवा के झोंके से खुद ही न टूट जाऊँ मैं।

सिलसिला काफ़ी पुराना है जीस्त में घने अँधेरों का
टिमटिमाते चिरागों से कब तक रोशनी फ़ैलाऊँ मैं।

सहमी-सहमी सी काँटों से उलझी दिल की ख्वाहिशें
कैसे पलकों के घरौंदों में अपने सपनो को सजाऊँ मैं।

इस कायनात में कुछ करीबी और अजीज भी हैं मेरे
मेरी उनको है फ़िक्र नही, पर कैसे उनको भुलाऊँ मैं।

तमाम रंजिशों के बाद गले मिलूँ? दिल धडकता है
कैसे हो मुमकिन, फ़िर से उनको अपना बनाऊँ मैं।

गहरी धुँध की एक दीवार खिंची है हमारे हर तरफ़
डर है कहीं खुद ही खुद से अजनबी न हो जाऊँ मैं।

काली आँधियों के ही रास्ते में बस्तियाँ हैं यादों की
काफ़िला उम्मीदों का अब किस जगह ठहराऊँ मैं।


.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Monday, March 12, 2012

{ ११४ } पानी की बूँद





यह पानी की बूँद है।
यह पानी की छोटी सी बूँद है।।

जब-जब नदिया बूँद-बूँद को तरसे
तब-तब बादल गरज-गरज बरसे
बूँदें झरती-गिरती-मिलती नदिया से
नदिया बहती-बहती मिलती सागर से।

कितना अदभुत आलिंगन है
बूँदों, नदिया और सागर का,
कितना मोहक अगाध-मिलन है
बूँदों, नदिया और सागर का।

बूँद से बूँद मिल-मिल कर
नदिया-सागर का पानी होता
पानी से पानी मिल पानी होता।

पानी से पानी में गाँठ नही पडती
पानी की बूँद पानी से जा जुडती।

यह पानी की बूँद है।
यह पानी की छोटी सी बूँद है।।


................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Sunday, March 11, 2012

{ ११३ } इंसान की तलाश





इन राहों में तलाश रहा हूँ
इंसान को.................
पर इंसान शायद यहाँ नहीं
इंसान तो
श्मशान या कब्रगाह में होंगे,
क्योंकि इंसान तो मर चुका है।

इन राहों पर सिर्फ़
गुनाह और हैवान
ही जिन्दा बचे हैं।

इनका ही कोलाहल
इस पूरे ब्रह्माण्ड को
प्रदूषित कर रहा है
और इंसान
हर दर पर
हर कदम पर
सिर्फ़ मर रहा है.
इंसान मर रहा है।।


...................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Saturday, March 10, 2012

{ ११२ } दूर होते किनारे






एक बहती नदिया
एक डगमगाती कश्ती
टूटती पतवारें
मासूम सी सिहरी हुई
जीने की जद्दो-जहद
पर असमंजस से भरी हुई
क्यों कि....
दूर होते किनारे
नजदीक आता हुआ समन्दर
जहाँ सब कुछ विलीन हो जाना है....
सब कुछ विलीन.................!!!!!


................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ १११ } नारी





नारी.....

राह हारी तू न हारी
थक गये पथ-धूल के
उड रहे रज-कण घनेरे
अब तक जो न मिट सके।

न थक सका है अभी तक
लक्ष्य-ध्येय का ध्रुव-तारा
तू प्रकृति है, ले चुकी है
जन्म से गति का सहारा।।


................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

Friday, March 9, 2012

{ ११० } तनहाइयों में हम






पहुँच सके कभी नहीं प्यार की ऊँचाइयों में हम
महफ़िल से उजडकर आ गये तनहाइयों में हम।

देखा है जब से आपको, मुझे खुद की खबर नही
शामिल हैं न जाने कब से आपके शैदाइयों में हम।

हम कभी उनके इश्क से न बाज आ पायेंगे यारों
गिने जायें दीवानों या कि दिलफ़िगारियों में हम।

मगर इश्क की शोहरत से जल्द ही निजात मिले
जिससे डूब जायें तेरे बहर-ए-खुशनुमाइयों में हम।

मैं सोचता रहता हूँ पर याद कुछ भी आता ही नही
किस कदर डूबे हैं तेरे ख्वाब की परछाइयों में हम।

सच तो यह है यारों कि अगर चोट न खाता ये दिल
न सुख होता, न डूबते इश्क की गहराइयों मे हम।

उफ़ नाजनीन की महफ़िल से खाली हाथ उठूँ कैसे
जाओ यारों रह लेगे इन तमाम तनहाइयों में हम।


...................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


शैदाई = प्रेमी
दिलफ़िगार = जख्मी दिल
बहर-ए-खुशनुमा = हुस्न का समुद्र


Wednesday, March 7, 2012

{ १०९ } मुझे वापस कर दे





वो रात और वो दिन मेरे अपने मुझे वापस कर दे
वो बीते हुए पल, वो मेरे सपने, मुझे वापस कर दे।

लफ़्ज़ मर चुके हैं सारे, हर सदा आसमाँ में खो गई
दर्द में डूबे हुए लम्हे मेरे अपने, मुझे वापस कर दे।

खुशरंग चेहरों की सजी हुई महफ़िल अब यहाँ नही
मेरी साँसें, मेरी सुखदाई महकें मुझे वापस कर दे।

अब यहाँ खंजर ही खंजर और आँसुओं के संगरेज़े है
मेरी कमनसीबी के हँसते सितारे मुझे वापस कर दे।

आग तो बुझ चुकी, सब तरफ़ धुआँ-धुआँ ही रह गया
मेरे सुखन, मेरी दर्द मे डूबी गज़लें, मुझे वापस कर दे।


............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल



Sunday, March 4, 2012

{ १०८ } किससे दिल की बात करूँ






रुसवाई और तनहाई साथी हैं अब किसका मैं साथ करूँ
किसको दिले जख्म दिखाऊं, किससे दिल की बात करूँ।

धन-दौलत की इबादत को ही, उठते हैं जहाँ हाथ हमेशा
किसको अपना हमराह कहूँ, किससे दिल की बात कहूँ।

ज़िन्दगी के सफ़र में अपनी साँसे ही हैं अपनी हमसफ़र
अब और किसका रहा सहारा, और किसके साथ चलूँ।

रात तो काली ही है हरदम अब दिन भी काला-काला है
मेरी किस्मत ही ऐसी है, मैं जलूँ और सारी रात जलूँ।

कौन है दिलबर मेरा जिसके लिये हो मेरा दिल बेकरार
सब ही हैं यहाँ बेगाने जैसे, किसके दिल में जा वास करूँ।


.............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Friday, March 2, 2012

{ १०७ } यूँ ही कट जाने दो






कभी हँसते हुए, कभी रोते हुए, यूँ ही कट जाने दो
ज़िन्दगी जीना काम है बस यूँ ही निपट जाने दो।

जिनसे गुलशन रूठा, जो हुए समन्दर उदासी के
मेरी इन सारी खुशियों को उनमे ही बँट जाने दो।

ज़ौर-ओ-सितम, तल्खियाँ, रुसवाइयाँ, मजबूरियाँ
दर्दे - दिल दुनिया के मेरे सीने में सिमट जाने दो।

रूह भी कब खुश रही है इस ज़िस्म-ए-फ़ानी से
ज़िस्म, पोशाक पुरानी है फ़टती है फ़ट जाने दो।

जल्द ही करीब आयें मौत से मिलने की घडीयाँ
ये जीस्त घटती जाती है इसे यूँ ही घट जाने दो।

कब रह पाया है कोई भी इस रैन बसेरे में हमेशा
ये अपना घर नही मुझे अपने घर पलट जाने दो।


................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल



ज़ौर-ओ-सितम = अत्याचार और जुल्म
तल्खी = कटुता
जिस्म-ए-फ़ानी = नश्वर शरीर

Thursday, March 1, 2012

{ १०६ } मोहब्बत का मंजर





तू जब मेरी दुनिया में बनकर मेरा मुकद्दर आयेगा
सच्ची मोहब्बत का मंजर दुनिया को नजर आयेगा।

अपने लबों पर तुम न लाओ चाहे मेरा नाम बार-बार
मेरा तुमसे है कोई रिश्ता, तेरे चेहरे पर उभर आयेगा।

ख्वाबों से रिश्ता और नींद से बोझिल हो जायेंगी आँखे
मुझसे इश्क करके ही तुम्हे जीने का हुनर आ पायेगा।

जरा मेरी आँखों के आइने में खुद को सजाओ - संवारो
तेरे जिस्म-दिलो-जान में सुरूर ही सुरूर उभर आयेगा।

आसमानों में लिखी तहरीर कुछ और भी धुँधली होगी
मेरी तस्वीर रहेगी आँखों में, और कुछ न नज़र आयेगा।

खूबसूरत और महकता सा एक गुलशन सजाओ दिल में
हर सुहानी शाम को खुद-ब-खुद ये भँवरा उधर आयेगा।


.................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल