Sunday, March 4, 2012

{ १०८ } किससे दिल की बात करूँ






रुसवाई और तनहाई साथी हैं अब किसका मैं साथ करूँ
किसको दिले जख्म दिखाऊं, किससे दिल की बात करूँ।

धन-दौलत की इबादत को ही, उठते हैं जहाँ हाथ हमेशा
किसको अपना हमराह कहूँ, किससे दिल की बात कहूँ।

ज़िन्दगी के सफ़र में अपनी साँसे ही हैं अपनी हमसफ़र
अब और किसका रहा सहारा, और किसके साथ चलूँ।

रात तो काली ही है हरदम अब दिन भी काला-काला है
मेरी किस्मत ही ऐसी है, मैं जलूँ और सारी रात जलूँ।

कौन है दिलबर मेरा जिसके लिये हो मेरा दिल बेकरार
सब ही हैं यहाँ बेगाने जैसे, किसके दिल में जा वास करूँ।


.............................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Friday, March 2, 2012

{ १०७ } यूँ ही कट जाने दो






कभी हँसते हुए, कभी रोते हुए, यूँ ही कट जाने दो
ज़िन्दगी जीना काम है बस यूँ ही निपट जाने दो।

जिनसे गुलशन रूठा, जो हुए समन्दर उदासी के
मेरी इन सारी खुशियों को उनमे ही बँट जाने दो।

ज़ौर-ओ-सितम, तल्खियाँ, रुसवाइयाँ, मजबूरियाँ
दर्दे - दिल दुनिया के मेरे सीने में सिमट जाने दो।

रूह भी कब खुश रही है इस ज़िस्म-ए-फ़ानी से
ज़िस्म, पोशाक पुरानी है फ़टती है फ़ट जाने दो।

जल्द ही करीब आयें मौत से मिलने की घडीयाँ
ये जीस्त घटती जाती है इसे यूँ ही घट जाने दो।

कब रह पाया है कोई भी इस रैन बसेरे में हमेशा
ये अपना घर नही मुझे अपने घर पलट जाने दो।


................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल



ज़ौर-ओ-सितम = अत्याचार और जुल्म
तल्खी = कटुता
जिस्म-ए-फ़ानी = नश्वर शरीर

Thursday, March 1, 2012

{ १०६ } मोहब्बत का मंजर





तू जब मेरी दुनिया में बनकर मेरा मुकद्दर आयेगा
सच्ची मोहब्बत का मंजर दुनिया को नजर आयेगा।

अपने लबों पर तुम न लाओ चाहे मेरा नाम बार-बार
मेरा तुमसे है कोई रिश्ता, तेरे चेहरे पर उभर आयेगा।

ख्वाबों से रिश्ता और नींद से बोझिल हो जायेंगी आँखे
मुझसे इश्क करके ही तुम्हे जीने का हुनर आ पायेगा।

जरा मेरी आँखों के आइने में खुद को सजाओ - संवारो
तेरे जिस्म-दिलो-जान में सुरूर ही सुरूर उभर आयेगा।

आसमानों में लिखी तहरीर कुछ और भी धुँधली होगी
मेरी तस्वीर रहेगी आँखों में, और कुछ न नज़र आयेगा।

खूबसूरत और महकता सा एक गुलशन सजाओ दिल में
हर सुहानी शाम को खुद-ब-खुद ये भँवरा उधर आयेगा।


.................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, February 29, 2012

{ १०५ } मुकद्दर पर विश्वास नही है





मेरा हबीब, मेरा दिलनशीं, अब मेरे पास नही है
कैसे हाले-दिल बयाँ करूँ, दिल में हुलास नही है।

हँसता हुआ चेहरा, पर टीस सी चुभती है दिल में
इस मुस्तकबिल से मुमकिन कोई निकास नही है।

लफ़्ज़ों की अपनी हैं सरहदे कैसे बयाँ हो हाले-दिल
मेरे खामोश लबों से मेरे दिल का एहसास नही है?

हम थे जितने करीब, अब उतने ही दूर हो गये हैं
महजूर हूँ, नसीब में अब शायद इख्लास नही है।

बे-नियाज़ हूँ या कि बेकरार हूँ कुछ भी पता नही
तुमसे बिछडने का गम, क्या कुछ खास नही है?

हुस्नो-इश्क की कैद से रिहा मुझको कर दिया
यही लगता है कि ये इंसाफ़ की इजलास नही है।

फ़िर भी गुले-ख्वाहिश दिल में खिलाये रखता हूँ
गुलज़ार-गुलिस्ताँ हैं, पर कहीं एशोनशात नही है।

किस्मत ही अब मिलायेगी किसी रंगीन मोड पे
ये मुराद तो है, पर मुकद्दर पर विश्वास नही है।


________________ गोपाल कृष्ण शुक्ल

हुलास=आनन्द
मुस्तकबिल=भविष्य
महज़ूर=वियोगी
इख्लास=दोस्ती, प्रेम
बे-नियाज़=विरक्त
इजलास=न्यायालय
एशोनशात=सुख-चैन


Monday, February 27, 2012

{ १०४ } मनोदशा....






मैं आदमी हो कर आज मर गया
क्या मैं फ़र्ज़ अपना पूरा कर गया।

न रह गया है अब घर-बार ही कोई
कहता है ज़माना, मैं क्या कर गया।

वक्त पर ही गुलशन में है गुल खिला
वक्त पर ही यह गुल भी गुज़र गया।

शौके आवारगी कभी रही नही अपनी
फ़िर क्यों मैं आज इतना सिहर गया।

हाथ खाली हैं और जेबें भी हुई खाली
इसी लिये अपना दिल आज डर गया।


............................. गोपाल कृष्ण शुक्ल

Sunday, February 26, 2012

{ १०३ } पैगामे-इश्क





इश्क ने भेजे हैं हसीन पयाम आपके लिये
दिल ने भेजे है लाखॊं सलाम आपके लिये।

हैरत है देखकर आपकी आँखों कि तिश्नगी
आ जाइये हाजिर है ये गुलाम आपके लिये।

बिजलियों और घटाओं की आशनाई में सजी
मस्त मौसमे-बहार का मुकाम आपके लिये।

इश्क को अपना धर्म इश्क को इबादत कहिये
भेजा है आशिकी का ही ईनाम आपके लिये।

मुझमे तुमने, तुझमे हमने इश्क ही है देखा
इस लिये भेजा इश्क का पैगाम आपके लिये।


........................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Saturday, February 25, 2012

{ १०२ } दिल करता है हाय हाय






हुआ है मेरा दिल दीवाना करता है हाय हाय
कोई नही है जो मेरे लिये प्रेम तराना गाये।
..................... दिल करता है हाय हाय।।

तकदीर भी बना गई है मुझे ऐसा वीराना
हर शमा जिसका बदन ही झुलसाती जाये।
......................दिल करता है हाय हाय।।

वृदावन बरसाने में ढूँढा मैने गलियों गलियों
मिली नही मेरी राधा जो मेरे संग रास रचाये।
.........................दिल करता है हाय हाय।।

राधा बिन मै विराना बस रोता रहता निश-दिन
मुझ गरीब की सुने न कोई सब मन मे मुस्काये।
.............................दिल करता है हाय हाय।।


......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Thursday, February 23, 2012

{ १०१ } दिल नही काबू मे






इश्क में इस दिल ने कितना गम उठाया है
दिन हो या रात हो इश्क ने सिर्फ़ रुलाया है।

तबीब भी न कर सकेंगे इलाज इस दिल का
ऐसा जख्म मेरी माशूक ने दिल पे लगाया है।

महजबीं तो सिर्फ़ खेल समझते हैं इश्क को
उस बेदर्द को मैंने दिल से अपना बनाया है।

न दिन को चैन है, न रात को मिलता सुकून
कमबख्त इश्क मेरे दिल में इतना समाया है।

न दिल ही है काबू में, न मैं ही हूँ अपने बस में
इश्क ने मुझे इतना पागल-दिवाना बनाया है।


..................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


तबीब=हकीम, वैद्य


Wednesday, February 22, 2012

{ १०० } भाग्य पथ






अगरू की बाती है
गंध, धूप बाती है
धूम्र की महक है
जलन की कसक है।

राहें हैं, तिराहें हैं
हर ओर चौराहे हैं
गलियाँ हैं, मोड हैं
कराहों की होड है।

सरकता जा रहा समय चक्र
निश्चित है सबका काल चक्र
बीत जाता कुछ मनमाफ़िक सा
कुछ दिखलाता अपनी चाल वक्र।

तपश्चर्या का महा पथ है
साधना का राज पथ है
धर्म भाव बनाता इसे सुपथ है
यही मानव का भाग्य पथ है।।


....................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ ९९ } दर्द के पैबन्द







तुम भी बदले हम भी बदले पर ये हालात न बदले
न ही खुश तुम न खुश हम पर ये सवालात न बदले।

इश्क के इस चिथडे बदन पर सभी हैं पैबन्द दर्द ही के
जुनूँ पर तंज सा करते रहते पर ये हालात न बदले।

दरिया की मौजों संग भटका जाने कितने घाव मिले
डगर-डगर गूँजे नग्मे दर्द भरे, पर ये हालात न बदले।

जल कर बुझना तो मुकद्दर ही था चिरागों का फ़िर भी
हवाओं को बेचजह रोका किया पर ये हालात न बदले।

दिल की तलाश में ही नाकामे-मोहब्बत के सफ़र में हूँ
हूँ दिल-शिकस्ता जीस्त भर गमों के लम्हात न बदले।



......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल