Wednesday, February 22, 2012

{ ९८ } पी, शराब पी - ४






जिओ जीस्त की हर घडीजी भर के और पी, शराब पी
उठा लुत्फ़ ज़िन्दगी के हर लम्हे का और पी, शराब पी।

रख कायम हौसला, बुजदिल बनेगा तो पग-पग मौत है
अरे ओ बावले, जीना है जीस्त तो शान से पी, शराब पी।

महफ़िले जानाँ हो, मक्तल हो, या हो सागरे - मयखाना
जिस जगह भी जाओ, जब भी जाओ बस पी, शराब पी।

जिन रास्तों पर जमा है भीड उनमे मंजिल का क्या पता
खुद बनाओ राह अपने लिये फ़िर आराम से पी, शराब पी।


............................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



महफ़िले जानाँ=प्रेमी की महफ़िल
मक्तल=कत्लगाह


Tuesday, February 21, 2012

{ ९७ } पी, शराब पी - ३





याद हैं इजहारे - मोहब्बत के पल जिसमे भी पी, शराब पी।
उन पलों को अपनी याद में जिन्दा रख और पी, शराब पी।

याद दिल में बनाये हूँ जालिम की हासिल करूँ उसका दिल
उसे अपना दिलबर बनाने के लिये मैंने खूब पी, शराब पी।

ऐ जालिम इतनी बेरुखी से न पेश आ दुखता है मेरा दिल
जान ले लेंगी मेरी दूरियाँ तेरी, आ पास आ, पी शराब पी।

मत रख गिला अपने दिलबर से, बेसबब नुक्साँ होगा
अब तखसीसे - मरज यही है, आ पास बैठ, पी, शराब पी।

हर बात जहर सी लगती है, जमाने से भी मिलते जख्म
न हो अफ़सोस, सँभला रहे दिल इसलिये पी, शराब पी।


.................................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


तखसीसे - मरज=रोग का निदान


Monday, February 20, 2012

{ ९६ } पी, शराब पी - २






गमों का कोई इलाज नही, दवा भी नही, केवल पी, शराब पी
गमज़दगी मे और कर भी सकते हैं क्या, बस पी, शराब पी।

क्या - क्या गजल कह दी हैं हमने, गजालाचश्म की जुदाई में
शबे-हिज्राँ में और अब किसका रहा सहारा, बस पी, शराब पी।

दिल बुझा - बुझा सा है और आ गईं शामे-गम की परछाइयाँ
माशूक से दूरी - तनहाई में क्या करूँ, बैठ कर पी, शराब पी।

हजारों जाम से टकराकर किया है हमने अपना जाम खाली
माशूक से है इतनी मोहब्बत मुझे, मैने खूब पी, शराब पी।

मोहब्बत में कहाँ गजब है मिलना - बिछड जाना माशूक से
मुझ सा दीवाना देख के न हो हैरान, आराम से पी, शराब पी।


................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


Sunday, February 19, 2012

{ ९५ } पी, शराब पी - १






कल हमने दिलबर की याद में कितनी ही शराब पी
आँखों मे तैरे नक्श, दिल में दर्द, होठों से शराब पी।

दिलरुबा भी गाफ़िल मुझसे, अपने भी ठुकरा गये
मैं हूँ दिल-शिकस्ता, इसलिये तनहा पी, शराब पी।

साथ नही है हमसफ़र तो क्या करें सैर गुलशन की
दूर हो अगर मयखाना, घर पे बैठ कर पी, शराब पी।

एक लम्बी उम्र बसर की है हमने गमे-यार के साथ
तुमको दो ही दिन भारी जुदाई के, आ पी, शराब पी।


............................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ ९४ } अजीज यादे





खुश्बू तेरे बदन की मेरा पीछा किये जाती है
तेरी अजीज यादें मेरी उमर बढाये जाती हैं।

हम तडपते हुए उदासी के समन्दर हो गये
खामोश निगाहें मेरी धडकने बढाये जाती हैं।

कहते हैं लोग सपना सुबह का सच बोलता
शब करवटॊं में फ़ज़र सपने सजाये जाती है।

अब तो शायद मै अपने हश्र को भी तरस जाऊँ
कमबख्त मौत भी हरबार मुँह चिढाये जाती है।

तेरा आशियाना भी मुझसे बहुत दूर तो है मगर
वस्ल होगा जरूर, रोज शबे-हिज्र बताये जाती है।


.................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


फ़ज़र-प्रातःकाल
शबे-हिज्रे=विरह रात्रि

Saturday, February 18, 2012

{ ९३ } टूटी मोहब्बत






दो घडी मयस्सर हो जाये दिलबर का हमसफ़र होना
उस घडी को ही कहते हैं सुनहरे सपनों का बसर होना।

मै तमाम दूर आ चुका हूँ मुझे साहिल से आवाज न दे
अब तो रास आने लगा है हमको बस दीदा-ए-तर होना।

तुम पर बरसती रहें तमाम महकते गुलों की ही खुश्बुयें
हर विलादत में चाहूँ मैं तेरी ही मोहब्बत का सजर होना।

तोड कर दिल मुड के भी न देखा, ये कैसा है मुकद्दर मेरा
मुसलसल जारी है इन ख्वाबों के महल का खंडहर होना।

तू नही मेरे मुकद्दर में पर मेरी मोहब्बत के साये तेरे लिये
मेरे मुकद्दर में ही लिखा है शायद बस यूँ ही दर-बदर होना।

मुझे इन हादसों ने संवार कर मेरा रंग-रूप ही बदल दिया
कब चाहा था मैने प्यार में ठुकराया हुआ सुखनवर होना।


............................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



दीदा-ए-तर=भीगी आँख
विलादत=जन्म
सजर=पेड
मुसलसल=लगातार
सुखनवर=गजलकार, शायर, कवि


Friday, February 17, 2012

{ ९२ } इश्क का अंजाम






उनकी खुशी कौन निहारे, हमको गम की शाम बहुत
हर पल ही जब दिल तडपे, कैसे कहें आराम बहुत।

इश्क मे कैसी शानो-शौकत, इश्क केवल अपनापन
इश्क की मीनारों को अक्सर मिलती मलाम बहुत।

अच्ल औ’ मसर्रत शैदाई का, सबको है नसीब कहाँ
हम जैसे गम के मारों को मयखाने की शाम बहुत।

हमने की इबादत हमेशा और कदम बोसी इश्क की
बेवफ़ाई औ’ रुसवाई का हमको मिला ईनाम बहुत।

इश्क मे बदनामी मिलती, चाहे जितना सादिक हो
इश्क में यारों हम हो गये गली-गली बदनाम बहुत।

इश्क जुआँ, इश्क बीमारी, इश्क न जाने दुनियादारी
इश्क न करना मेरे यारों, इसका है बुरा अंजाम बहुत।


....................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


मलाम=डाँट-डपट
वस्ल=मिलन
मसर्रत=साथ, संग
शैदाई=प्रेमी
सादिक=प्रेमी


Thursday, February 16, 2012

{ ९१ } दिल की कही





खूब कही हैं हमने इश्क और प्यार की गज़लें
कुछ रुसवाई की, कुछ हुस्नो-दीदार की गज़लें।

कुछ में कही माशूक की कसमें कुछ मे रुसवाई
कुछ आई दिल से निकल कर बेजार सी गज़लें।

दिखी है कुछ सुखनों मे ज़िन्दगी बहुत करीब से
हाँ ! कुछ बयाँ हो गईं संसार-ईसार की गज़लें।

कुछ ने दिलाई मुझे जमाने से बहुत ही रुसवाई
दिल का फ़साना भी बयाँकर गईं प्यार की गज़लें।

जाने कैसा मिजाज बना जाने क्या दिल ने कहा
आज बस यूँ ही रख दीं चँद अशआर की गज़लें।


................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


बेजार=अप्रसन्नता
सुखन=गज़ल
ईसार=स्वार्थत्याग


{ ९० } वक्त





वक्त कब कहाँ ठहरा है।

वक्त तो अन्धा-बहरा है
वक्त पर बैठा पहरा है
कभी यह लगे सुनहरा है
कभी यह बहुत गहरा है।
वक्त कब कहाँ ठहरा है।।

वक्त करता उत्साह निराला है
वक्त कभी सफ़ेद कभी काला है
वक्त आफ़त का परकाला है
वक्त ही प्राणों का रखवाला है
वक्त से ही आदमी सिहरा है।
.....वक्त कब कहाँ ठहरा है।।

वक्त भाग्य हमारा लिखता है
वक्त नही किसी को दिखता है
वक्त हमको कभी अखरता है
वक्त सब का जरूर निखरता है
तब हम कहते वक्त सुनहरा है।
........वक्त कब कहाँ ठहरा है।।

वक्त कराता है आत्म-दर्शन
वक्त सिखाता न करो प्रदर्शन
वक्त ही बताता करो निदर्शन
वक्त ही वक्त का आकर्षण
सब से नाता वक्त का गहरा है।
........वक्त कब कहाँ ठहरा है।।


................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, February 15, 2012

{ ८९ } ढूँढता हूँ





न खजानों को ढूँढता हूँ, न जागीरों को ढूँढता हूँ
करे ज़िन्दगी रोशन, उन सितारों को ढूँढता हूँ।

कायनात तुमसे है, लोग नाहक सवाल पूछते हैं
बेसब्र हूँ, छूटे फ़ुरकत, उन सहारों को ढूँढता हूँ।

मोहब्बत बेहिसाब, अब तो होश भी गवाँ बैठा
मासूम दिल तडपे, बिछडे बहारों को ढूँढता हूँ।

मद्धिम हुआ आफ़ताब, ऐसी है सिफ़त तुममे
चाँदनी रात में उन जैसे नजारों को ढूँढता हूँ।

परख आशिकी की, सीरत और नफ़ासत से है
जो मुझे बनाये सोना उन अँगारों को ढूँढता हूँ।

जब भी निकला इबादत को मैखाने चला गया
और भी हैं लोग ऐसे, उन दिलदारों को ढूँढता हूँ।

अपने रंगों को भर सकूँ मैं इस जमाने में यारों
ज़िन्दगी के फ़लक पर उन इशारों को ढूँढता हूँ।

शहर की बेरुखाई से अब तो जी भर चुका मेरा
सुकूँ के लिये बियाबान मे दियारों को ढूँढता हूँ।

मै ढूँढता हूँ यहाँ-वहाँ, जाने क्या-क्या ढूँढता हूँ
तलाश अब भी बाकी उन निर्विकारों को ढूँढता हूँ।


............................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


कायनात=ब्रह्मांड
फ़ुरकत=जुदाई
आफ़ताब=सूर्य
सिफ़त=खूबी
सीरत=गुण
नफ़ासत=मृदुलता
फ़लक=आसमान, चित्र-पटल
दियारा=दीपक
निर्विकार=आत्म-तत्व