Wednesday, February 15, 2012

{ ८८ } काँटों की भाषा





काँटों की परिभाषा क्या है ?
क्या तुम जानते हो ?

काँटों की भाषा क्या है ?
क्या यह भी तुम समझते हो ?

काँटों की भाषा को समझना
एक कला है।
इसको जीवन जीने की
कला भी कह सकते है।

काँटों की अपनी
कोई बोली नही होती,
वह तो
आप जैसा समझते हैं
वैसा ही बोलती है।

हाँ
यह जरूर है कि
काँटों की भाषा समझने पर ही
सुखद-स्पर्श की परिभाषा
समझ में आती है।

पुष्प-स्पर्श की
कोमलता का आभास
हमको तभी होता है
जब हम
काँटों की चुभन को
पहचानते हैं।
उससे उठने वाली
टीस को महसूस करते है।

यही काँटों की भाषा है
और यही काँटों की परिभाषा।।


.................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Monday, February 13, 2012

{ ८७ } अदब अब सिखाता कौन है





प्यार के गीतों की गंगा मे नित नहाता कौन है
अब हर घडी प्रेम-रस को ही गुनगुनाता कौन है।

दिन के जगते ही नैन नीर भर कर रोती हैं यादें
रात को सुनहरे सपनों की लोरी सुनाता कौन है।

नफ़रतों के नाम लिखी जिसने अपनी ज़िन्दगी
ऐसे बदराह इंसान को यहाँ सिर झुकाता कौन है।

लुटते रहें हमसफ़र सामने चाहे अपनी निगाह के
दुनिया में अब गैर को अपना दोस्त बनाता कौन है।

बस छोटे खयालों के लम्बे जुम्लों की हकीकतें हैं
मकसदे-ज़िन्दगी और अदब अब सिखाता कौन है।


.......................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



Sunday, February 12, 2012

{ ८६ } जीवन के रंग





जीवन-पथ में हमने रंग बहुतेरे देखें हैं
कुछ उजले औ’ कुछ पीले-काले देखे हैं।

अब तक जितनी उम्र नही देखी
अनुभव उससे ज्यादा देखे है।
अपने इस सुघर नीलाकाश मे
कुछ काले-अँधियारे बादल देखे हैं।।

पंछी बन-बन कर आसमान में
हमने ऊंची-ऊंची उडान भरी है।
पर जब-जब भी हमने नीचे देखा
अपनी धरती पर कालिमा ही झरी है।।

वेदनायें अब क्रीत दासियाँ सी हो गईं हैं
भावनायें दर्द समेट बियावान में खो गईं हैं।
क्या करूँ, क्या न करूँ कुछ सूझता नही है
मार्ग में अंधकार घनघोर, कुछ बूझता नही है।।

अब आसरा है सिर्फ़ ईश का अपने
वे ही बुद्धि हमारी निर्मल करें।
मार्ग दिखलाया "जगन्नाथ" ने
जो, उसको कंटक विहीन करें।।


..................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ ८५ } वरक-ए-ज़िन्दगी





ज़िन्दगी__________

ज़िन्दगी है मेरे भाई
कोई ज़रीदा नही
जिसका हर वरक
काली स्याही से रंगा जाये।

ज़िन्दगी मे अधिकतर
ऐसे ही वरक लिखे जाते हैं
जहाँ कलम तो चलती है
पर वरक--------
सादे के सादे ही रह जाते हैं।
--------सादे ही रह जाते हैं।।


................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल


ज़रीदा=अखबार
वरक=पन्ना

Saturday, February 11, 2012

{ ८४ } मंजिल फिसलती रही





मेरी गिरफ़्त से मंजिल फ़िसलती रही
मुझसे तेज मेरी ज़िन्दगी चलती रही।

हर कहीं ढूँढा मिल सकी न एक झलक
दिल पर सिर्फ़ बिजलियाँ गिरती रहीं।

अब काँटों पर प्यार लुटाते जा रहे हैं हम
फ़ूल सी ये ज़िन्दगी खारों से भरती रही।

बेवफ़ा पर यकीं करता रहा अपना समझ
ताउम्र ज़िन्दगी गले हादसों के लगती रही।

देखते कुछ है, बयाँ कुछ और ही कर रही
ये ज़िन्दगी बस हकीकत से छुपती रही।


..................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Friday, February 10, 2012

{ ८३ } बस तुम ही हो...





बस तुम ही हो......................

बस तुम ही हो......................
एक मासूम अजूबी सी
ऊपरवाला चाह कर भी
दुबारा ऐसी रचना नही कर सका
किसी नदिया की तरह
हँसती - मचलती
इठलाती - बलखाती.....

जिस डगर से
जिस राह से गुजरती हो
तुझे देखने वाले सब
सन्न से रह जाते हैं
हर पत्ता, हर डाली
सावन की घटायें
और यहाँ तक... अब तो...
यह मधुमास भी
मुझसे तेरा पता पूँछता है

काश !
मैं जानता होता
तुम्हारा पता - ठिकाना

तब तुम...
सिर्फ़ मेरी...
और मै..
सिर्फ़ तुम्हारा होता

सिर्फ़ तुम्हारा.......
सिर्फ़ तुम्हारा.......


............................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


Tuesday, February 7, 2012

{ ८२ } धर्म बडा या देश ?





धर्म बडा या देश ?
करो मत इसमें अन्तर विशेष ।

दोनो का रखो मान
मत करो अभिमान
दोनो हैं एक-दूसरे के पूरक
जन-जन तक पहुँचाओ
महापुरुषों का यह सन्देश ।

जोड-घटा कर अगर
फ़िर भाग करोगे
तो
क्या रह जायेगा शेष ?

समझ लो यह गणित
धर्म भी है बडा
और बडा है देश ।।


.................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ ८१ } मए-पैमाना





ज़िन्दा रहने के लिये जरूरी है मए-पैमाना कोई
क्या यूँ ही बेवजह कहीं जाता है मयखाना कोई।

जरूरी है क्या मौत की वजह बताओ शराब को
मौत को तो मिल ही जायेगा नया बहाना कोई।

दर्दो-गम, दिले-जख्म और दुनियावी फ़रेबों को
मेरे शिकस्ता दिल से हटाता है मए-पैमाना कोई।

इन सागरो-मीना को अभी न हटाओ सामने से
बहुत याद आ रहा है आज पुराना याराना कोई।

ऐ दोस्तों, ये पैमाने मोहब्बत का भरम पाले है
वरना आता नहीं मेरे पास इश्के-दीवाना कोई।

............................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


Monday, February 6, 2012

{ ८० } सफ़रे-ज़िन्दगी





इकरामे-ज़िन्दगी के सफ़र को तय मुझको ही तो करना है
मिले जख्म तो जीना है, साँस लेते हुए भी तो मरना है।

रह गई ख्वाहिश दिल में, न बने हम दिलबर किसी के
इस सजी महफ़िल में, तनहा मुझ ही को तो रहना है।

भरी है रंजोगम और पीर से ज़िन्दगी की गुजरी कहानी
मयस्सर नहीं लबों को हँसी पर हँसते हुए ही तो रहना है।

लफ़्ज़ है, इबारत है, जुबाँ भी है, पर कहना कुछ भी नहीं
हैं लब सिले, खामोश हूँ, चुप रहते हुए ही तो सहना है।

पर्वतों से भी बुलन्द हो जायें चाहे कफ़स की सब दीवारें
बेडी पाँवों मे, हाथों मे हथकडी मंजिल पाकर तो रहना है।

अपने ख्वाबों की मंजिल से भी आगे, अभी दूर है चलना
उजली चाँदनी या अमावस की रात, रस्ता तय तो करना है।

हर लम्हा लडता रहूँगा हर चुनौती जँग से इस यकीं के साथ
इकरामे-ज़िन्दगी के सफ़र को तय मुझको ही तो करना है।


................................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


इकरामे-ज़िन्दगी=भगवान की दी ज़िन्दगी
कफ़स=कारागार


Wednesday, February 1, 2012

{ ७९ } दस्तक





दिलो-जाँ में सिर्फ़ खुश्बुएँ ही खुश्बुएँ रह गईं हैं
तू तो चली गई मेरे पास तेरी आहटें रह गईं हैं।

आज ये कैसा दौर आ गया है इस मयखाने में
खाली हैं ज़ाम - पैमाने सूखी कराबें रह गईं हैं।

महजबीं से सिर्फ़ वफ़ाए इश्क ही तो चाही थी
होठ सिल लिये है, खंजर सी अब्रुएँ रह गईं हैं।

ऐसे भी लम्हे आए जो दिल में जख्म बन गये
चीख कर निकलती हमारी ख्वाहिशें रह गईं हैं।

खो चुका तुम्हे पर तेरा इन्तज़ार न होगा खत्म
तेरे दिल के दरवाजे पर मेरी दस्तकें रह गईं हैं।


......................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल


कराब=शराब की सुराही
अब्रुएँ-भौं