Saturday, February 5, 2011

{ १० } दिल ही तो है......







दिल तो दिल जाँ निसार है तुम पर,
इस कदर मेरा एतबार है तुम पर ।

ये साँसें चलती रहे या कि थम जाये,
अब सारा ही दारोमदार है तुम पर ।

हाय, कमबख्त ये लब नही खुलते,
मगर मेरी आँखें बारबार है तुम पर।

मगर याद रखना कहीं भुला नही देना,
आज भी एक वादा उधार है तुम पर।

तू अगर हाँ कह दे तो मै चैन से जी लूँ,
मेरी जान, मेरा सब्रो-करार है तुम पर ।


..................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



Friday, February 4, 2011

{ ९ } खुदा ही हमारा बना मददगार है




न ही है कोई मेरा दुश्मन, न ही कोई मेरा यार है,
मैं हूँ सिर्फ़ एक इंसान, मुझको सभी से प्यार है।

ये दुनिया ! केवल दुनिया ही नही एक बाजार है,
चाहे जिधर देखो, हरतरफ़ खडा एक खरीदार है।

सिर्फ़ पाने की चाहत दिलों में पाले हुए हैं सभी,
कोई नही है ऐसा जो कुछ देने को भी तैयार है।

जिसने अपना कभी भी किसी को बनाया नहीं,
इस दुनिया में उसका जीना ही समझो बेकार है।

पर न हो मायूस तुम इस इकराम-ए-ज़िन्दगी से,
रहमते आलम खुदा, खुद बना हमारा मददगार है।


................................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल


इकराम-ए-ज़िन्दगी = ईश्वर की दी हुई ज़िन्दगी



{ ८ } यही गुनता रहा मैं रात भर.....






सपने सारे भस्मित हो गये,
सपने ही बुनता रहा मै रात भर,
आग ! ये जाने कैसी लगी है,
यही गुनता रहा मैं रात भर ।

आशियाना अब अपना कहाँ रहा,
उडा कर ले गईं तेज हवायें,
न जाने ये कैसी आँधियाँ हैं,
यही गुनता रहा मैं रात भर ।

रेत के टीलों पे देखो,
हो रही ओलों की बारिश,
अब कहाँ मै सर छुपाऊँ,
यही गुनता रहा मैं रात भर ।

जमीं औ’ आसमाँ जहाँ पर हैं मिले,
स्वप्न में देखा था उसे कभी,
कौन होगा साथ मेरे उस मंजिल के लिये,
यही गुनता रहा मैं रात भर ।

चित्र सारे चित्रपटल के धुल चुके,
क्यॊ हुआ था ऐसा घनागम,
चिंतित चितेरा अब क्या करेगा,
यही गुनता रहा मैं रात भर ।

आम के पेडों मे देखो अब,
उगने लगी हैं निमकौरियाँ,
बोया था जो अब उसे ही भोग रहे,
यही गुनता रहा मैं रात भर ।

आदमी से आदमी का क्या रह गया संबन्ध,
अब आदमी से आदमी क्यों डरने लगा है,
दोष इसमें है पशुवत आचरण का,
यही गुनता रहा मैं रात भर ।

कुछ आवाजें कुछ हल्ला-गुल्ला,
यही सब सुनता रहा मै रात भर,
मानुष क्या था क्या हो गया,
यही गुनता रहा मैं रात भर ।

..................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ७ } काश ! कहीं तुम मेरे होते ! ! !






काश ! कहीं तुम मेरे होते।


भावों को मिल जाते अम्बर,
सतरंगी हो जाते सब मंजर,
स्वप्निल सभी सबेरे होते,
काश ! कहीं तुम मेरे होते ।


शब्दों का तब छोड़ तमाशा,
हम रचते नयनों की भाषा,
ग़म भी नहीं घनेरे होते,
काश ! कहीं तुम मेरे होते ।


रूप जहाँ खुल कर मुस्काता,
रस में भीगी गन्ध लुटाता,
ऐसी जगह बसेरे होते,
काश ! कहीं तुम मेरे होते ।



..................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



{ ६ } दुनिया की मुश्किलें







कुछ भी मुश्किल नही, मगर आदमी होना मुशकिल है,
सिर्फ़ चार दिन की ज़िन्दगी, पर जीना बहुत मुश्किल है।

कानों पर भरोसा नही, दुनिया को अपनी आँखों से देखो,
क्योंकि कौन भला है कौन है बुरा, ये कहना मुश्किल है।

जग में छाया अँधेरा देख रहा है, उजाले की राह कब से,
खो गई कहीं इस दुनिया से रोशिनी, ये कैसी मुश्किल है।

है नींव मजबूत भरोसा भी है उसपर, सो इमारत खड़ी है,
मत बहको, खिसकी जो एक ईंट तो संभलना मुश्किल है।

मतलबी दुनिया को यारों मारो ठोकर तो दुनिया साथ चले,
वरना इस मतलबी दुनिया में सिर्फ़ मुश्किल ही मुश्किल है।

हम अपने लिये क्या और कैसे कहें, आप ही कुछ कहेंगे,
ये शायर के खयाल हैं, इसपे कुछ कहना कहाँ मुश्किल है।

……………………………………………… गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ५ } स्त्री....






स्त्री,
एक छोटा सा शब्द,
कई विशाल अर्थ।

स्त्री मात्र शब्द नहीं,
स्त्री एक विचार है।
स्त्री मात्र शब्द नही,
स्त्री परिवार है।

स्त्री के बिना परिवार की कल्पना,
कभी सच न होने वाला सपना।

जन्मदायिनी माँ, एक स्त्री,
स्नेह की मूर्ति बहन, एक स्त्री,
जीवन यात्रा की संगिनी पत्नी, एक स्त्री।

तमाम ऐसे ही संबन्ध,
जैसे, दादी, नानी, मौसी,
बुआ, भाभी, बेटी आदि-आदि,
सभी का अपना महत्व।

स्त्री मात्र शब्द नही,
स्त्री एक भाव है।
स्त्री मात्र संबन्ध नहीं,
स्त्री एक निर्वाह है।

स्त्री, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई है,
स्त्री, राजपूताना गौरव पन्ना धाई है,
स्त्री ,प्रेम पुजारन मीरा है,
स्त्री, रानी पद्मिनी के जौहर की पीरा है,
स्त्री, ममता की मूरत यशोदा माता है,
स्त्री, असहाय देवकी की कारुणिक गाथा है,
स्त्री, सीता, तारा, मन्दोदरी है,
स्त्री, कुन्ती, द्रौपदी और गान्धारी है,
स्त्री, लय का आरोह है, अवरोह है,
स्त्री, राग कल्याणी है, राग भैरव है,
स्त्री, कपाल कुण्ड़ला, मुक्त केशा, काली है,
स्त्री, स्वर प्रदायनी, वाग्देवी, ब्राह्मी सरस्वती है,
स्त्री, महिषासुर मर्दिनी, जगदम्बा दुर्गा है,
स्त्री, सरल सलिला, भागीरथी गंगा है।

स्त्री, मात्र शब्द नही .......
स्त्री, संसार है,
स्त्री, जगत जननी है,
स्त्री, तीर्थ है,
स्त्री, मोक्ष है।

स्त्री, मात्र शब्द नही।।
स्त्री, मात्र शब्द नही ॥

................................................ गोपाल कृष्ण शुक्ल

Thursday, February 3, 2011

{ ४ } कारवां







चन्द सांसों का ही है ये कारवाँ ज़िन्दगी,
अब तो गुजर जाये चाहे जहाँ ज़िन्दगी।

हमने तुमसे कहा, तुमने उससे कह दिया,
कहते और सुनते हो गई दास्ताँ ज़िन्दगी।

मौरूसी मे तुमको खन्जर ही खंजर मिले,
हमको मिली है देखो ये बे-जुबाँ जिन्दगी।

देखो, पल भर में ही ये कैसे हो गई यारों,
किसी बुलबुले की तरह बे-निशाँ ज़िन्दगी।

जुस्तज़ू करते-करते अब थक सा गया हूँ मै,
इस जहाँ मे खो गयी है जाने कहाँ ज़िन्दगी।

……………………........…… गोपाल कृष्ण शुक्ल




१- मौरूसी  = विरासत

Wednesday, February 2, 2011

{ ३ } गीत मै कैसे सुनाउँ ?




गीत मैं कैसे सुनाऊँ,
स्वप्न तो देखे बहुत,
आकार उनको कैसे दिलाऊँ,
गीत मैं  कैसे सुनाऊँ।

लेखनी रूठी हुई,
शब्द, अर्थ को खो चुके,
भाव मन के कैसे सजाऊँ,
गीत मैं कैसे सुनाऊँ।

तूलिका टूटी पडी,
रंग सारे सज न पाये,
चित्र मैं कैसे बनाऊँ,
गीत मैं कैसे सुनाऊँ।

रागिनी रूठी हुई,
ताल भी साथी नहीं,
साज मैं कैसे बजाऊँ,
गीत मैं कैसे सुनाऊँ।

साँझ अब ढलने लगी,
चाँद आने को मचलता,
रमणी बिन रैन बिताऊँ,
गीत मैं कैसे सुनाऊँ।


................................. गोपाल कृष्ण शुक्ल