Monday, October 31, 2022

{३९७} मेरा परिचय क्या





मैं क्या, 
मेरा परिचय क्या। 

प्रभु सत्ता से भिन्न 
मेरी अपनी सत्ता क्या। 

ये जीवन, जीव-मरण का अभिनय है, 
सुकर्म, मनुज-जीवन की यज्ञ-आहुति,
परमार्थ, मनुज-जीवन का है तर्पण,
सत्य-पथ से न हो तुम विचलित, 
रहो अग्रसर धर्म-पथ पर,
तन-मन-धन सब कर दे अर्पण,
तू क्या,
तेरा परिचय क्या। 

मैं क्या, 
मेरा परिचय क्या।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, October 30, 2022

{३९६ } तुम्हारे इंतजार में





वापस जाते हुए 
चूमना था तुम्हें,
अपनी आँखों से 
ओझल होने तक 
देखना था तुम्हें,
होंठों की बुदबुदाहट 
बन्द होने के पहले 
कहने थे कुछ शब्द,
गिनना था अँगुलियों पर 
अपनी अगली मुलाकात का 
लम्बा दुखदायी अन्तराल। 


अचानक आँखों से 
दो आँसू टपके 
और तुम यकायक 
आँखों से ओझल हो गयी। 

मैं आज भी 
वहीं अनथक बैठा हूँ,
सिर्फ तुम्हारे इंतजार में।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Saturday, October 29, 2022

{३९५ } ज़िन्दगी दर्द भी है खूबसूरत भी





अदावत भी  है और मोहब्बत भी 
ज़िन्दगी  दर्द भी है  खूबसूरत भी। 

शबे-रोज  पढ़ता हूँ  तुम्हारी आँखें 
ये शरारत भी है और मोहब्बत भी। 

ज़िन्दगी में  गर दो-चार ग़म मिले  
वो नसीहत भी है और हिम्मत भी। 

माँ का आँचल है  अपना आसमाँ  
यही इनायत भी और इबादत भी। 

यूँ ही फ़कीरी में तेरे गुण गाता रहूँ  
यही मोहब्बत भी यही इबादत भी। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, October 27, 2022

{३९४ } तुम पर है जाँ निसार





तुम पर है जाँ निसार 
कर लो अब एतबार। 

फिरता हूँ मैं भटकता 
कब से हूँ मैं बेकरार। 

तिशनगी रूह की मिटे 
आ बन कर वो फुहार। 

हो गई दर्द की इंतिहा 
सुन ले दिल की पुकार। 

जिंदा रहे मेरी मोहब्बत 
खत्म कर मेरा इंतजार। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३९३ } चाहत के हरफ़





कुछ और  मेरे पास आ 
मेरे सँग तू भी  मुस्कुरा। 

भरोसा न हो  गर मुझपे 
तू  रकीबों के पास  जा। 

क्यों हो  रही बावरी  सी 
घड़ी दो घड़ी रुक जरा। 

इस दर्द से मुझे कर बरी 
या मेरा दर्द और दे बढ़ा।  

तेरी चाहत के हैं ये हरफ़ 
तू भी पढ़ और  गुनगुना। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 


रकीब = दूसरा प्रेमी 
हरफ़ = अक्षर 

Wednesday, October 26, 2022

{३९२} ज़िन्दगी का हिसाब





मेरी  ज़िन्दगी  की  किताब 
काँटों  सजा  कोई  गुलाब। 

वक्त   की  कश्मकश   में 
ढ़ल  गया  उम्र  का शबाब। 

कभी  दिन  सवाल  से खड़े 
कभी  रात  उसका  जवाब। 

कभी रात का चाँद ज़िन्दगी 
कभी  भोर  का  आफ़ताब। 

राज नहीं जीस्त  की कहानी 
यही मेरी ज़िंदगी का हिसाब। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३९१ } जहर के घूँट हँस-हँस के पिए हैं





जहर के घूँट हँस-हँस के पिए हैं 
हम बहरहाल सलीके से जिए है। 

एक दिन हमको भी याद करोगे 
चंद अफ़साने जमाने को दिए हैं। 

हमको दुनिया से दिली मोहब्बत 
बहुत इल्जाम दुनिया ने दिये हैं। 

ग़म की दौलत भी खूब मिली है 
ज़ख्म भी खाए आँसू भी पिये है। 

न की परवाह कभी रंजों-ग़म की 
शान से रहे और शान से जिये हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Sunday, October 23, 2022

{३९० } खुशियों को कैसे मैं गम कहूँ





मिली खुशियों को कैसे मैं गम कहूँ 
मुस्काती आँखों को कैसे नम कहूँ। 

तेरा  ही तो  मेरे दिल  पर  राज है 
सिर्फ तुमको ही तो मैं सनम कहूँ। 

देख कर मुझको जो वो मुस्कुरा दे 
तो उसे दिलबर का ही करम कहूँ। 

वो तिरछी नजरों से मुझे बुला रही 
सच कहूँ इसे  या कि  भरम कहूँ। 

तुम जो आज मिले हो मुझसे यहाँ 
इसे मैं बस रब का ही करम कहूँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Friday, October 21, 2022

{३८९ } ये मेरी बज़्म नहीं





ये  मेरी  बज़्म नहीं मगर 
दिल  मेरा  यहाँ  लगा है। 

जाने वालों  को रोको मत 
रँगे-महफ़िल  तो जमा है। 

एक मँजर सा मेरे दिल में 
आरजुओं  का भी लगा है। 

उस  पर  रखो मरहम को 
जो  ज़ख्म  अभी  हरा  है। 

चलो चलें उस राहे ख्वाब पे 
जो ख्वाब आँखों में बसा है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{३८८ } आँखों में बसा किसी का ख्वाब है





आँखों में  बसा  किसी  का ख्वाब है 
हुजूर उसका नूर बहुत लाजवाब है। 

बैठे हैं कई रिन्द एक लम्बी कतार में 
उसकी आँखे  जैसे महँगी शराब है। 

मेरी  फितरत  फबेगी  खूब तुझ पर 
तेरे चेहरे पर पड़ा मेरा ही हिजाब है। 

फूलों  की  घाटी में दिल का कारवाँ 
क्या खूब उतरा सुनहरा सा ख्वाब है। 

खुद से कहा-सुनी के मजे लूट रहा हूँ 
अपने सवाल का अपना ही जवाब है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल